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जवाबदेय सरकार जरूरी

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संसद के पहले ही सत्र में सरकार को इस बात का एहसास हो चुका है कि अब वह अपनी मनमर्जी नहीं कर सकती है उसके हर फैसले पर विपक्ष तीखे सवाल उठयेगा और सरकार को हर सवाल का जवाब देना ही पड़ेगा। जवाब संतोषजनक नहीं होगा तो सरकार की किरकिरी होगी। 10 साल तक जिस तानाशाही के डंडे से देश को हांका जाता रहा है वह अब संभव नहीं होगा। एक स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए जवाबदेय सरकार का होना जरूरी है। मगर वर्तमान एनडीए सरकार को यह कतई भी रास नहीं आ रहा है, पीएम मोदी और उनके मंत्रियों को विपक्ष की मौजूदगी इस कदर खल रही है कि वह विपक्ष पर अपना गला घोटने का आरोप लगाये जा रहे हैं। यही नहीं सत्ता पक्ष द्वारा सवालों का सटीक जवाब देने के बजाय अभी भी गलत तरीके और झूठे तथ्यों के जरिए स्वयं को सही साबित करने के जो प्रयास किये जा रहे हैं वह सत्ता पक्ष की मुसीबत को लगातार बढ़ा रहे हैं। सरकार द्वारा वक्फ संशोधन एक्ट 2024 के रूप में अपना पहला बिल पेश किया गया जिसे भारी विरोध के बीच जेपीसी को सौंपना पड़ा। संसद में जब इस एक्ट पर चर्चा की जा रही है उस समय आप सांसद संजय सिंह ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए सरकार की उसे हेयरकट योजना पर तीखा प्रहार किया गया जिसमें सरकार ने उघमियों को राहत देने के नाम पर 43 कंपनियों का 5 लाख 44 हजार करोड़ के ऋण में से 3 लाख 53 हजार करोड़ का ऋण माफ किया गया है। खास बात यह है कि यह बड़ा ऋण उन कंपनियों का माफ किया गया जिन्होंने सरकार या भाजपा को चुनावी बांड के जरिए पैसा दिया गया। जिन कंपनियों पर कर्ज का बोझ कम करने के नाम पर इतनी बड़ी धनराशि माफ की गई वह पैसा सरकार का नहीं जनता का पैसा था। सरकार किसानों का कर्ज माफ नहीं करती है छोटे व्यापारियों को कोई राहत नहीं देती है युवाओं को कोई राहत नहीं देती है वह चंद कंपनियों को राहत देने के नाम पर इतनी बड़ी धनराशि खर्च कर देती है इससे किसानों का पांच बार कर्ज माफ किया जा सकता था शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाओं की हालत में सुधार संभव था। संसद में भ्रष्टाचार, महंगाई और किसानों तथा बेरोजगारी के मुद्दों की बजाय धन्ना सेठों की सरकार द्वारा जो मदद की जा रही है उसकी अब सारी परतें एक—एक कर खुल रही है। सरकार की नीतियों व नीयत को लेकर जो सवाल आज विपक्ष उठा रहा है उसका कोई जवाब सत्ता में बैठे लोगों के पास नहीं है। 10 सालों में सरकार ने किसके लिए क्या किया किसको कितना दिया और इसके साथ ही किस किससे कितना लिया उसका हिसाब किया जा रहा है। जो सत्ता पक्ष के लिए बड़ी परेशानी का सबक बन चुका है। जितना छाना जा रहा है उतनी किरकिरी हो रही है। स्वास्थ्य बीमा पर सरकार 18 फीसदी जीएसटी वसूल कर रही है जिसका विरोध विपक्ष ही नहीं सरकार के मंत्री तक कर रहे हैं अब भाजपा सरकार के 10 साल का ढोल फट चुका है। यही कारण है कि हर रोज सरकार पतन की ओर अग्रसर है और यह सवाल आम हो गया है कि सरकार ऐसे कितने समय तक टिकी रह पाएगी। संसद से लेकर कोर्ट तक हर जगह सरकार की फजीहत हो रही है। 10 सालों में आम आदमी की जिंदगी पर जो प्रभाव पड़ा है उसके परिणाम अब सामने आने लगे हैं और सरकार को इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा है। जो देश में बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा है।

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