किसकी जीत, किसकी हार

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लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा और एनडीए के नेता इस बात को लेकर खुश है कि वह लगातार तीसरी बार सत्ता पर काबिज हो गए हैं। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के लिए उनकी यह हार भी किसी जीत से कम इसलिए नहीं है क्योंकि वह देश के संविधान व लोकतंत्र बचाने के जिस मुद्दे को लेकर चुनाव में गए थे उसमें वह पूरी तरह सफल रहे हैं। देश को कांग्रेस मुक्त बनाने और संसद को विपक्ष विहीन बनाने तथा अपने मनमाने तरीके से देश को चलाने के सत्ता पक्ष के मंसूबों पर पानी फेरने में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन सफल रहा है। जो देश और लोकतंत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है। 10 साल पहले 2014 में संवैधानिक व्यवस्थाओं को ताक पर रखकर एक षड्यंत्र के तहत नेता विपक्ष के जिस पद की हत्या मोदी सरकार द्वारा कर दी गई थी 2024 के चुनाव में जनादेश ने उसे पुन जीवित कर दिया है। पूर्ववर्ती सरकार के अंतिम संसद सत्र में प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष के विरोध और हंगामे पर बोलते हुए कहा था कि 2024 के बाद विपक्ष दर्शक दीर्घा में बैठा नजर आएगा। उन्होंने वर्तमान चुनाव प्रचार के दौरान भी कहा था कि इस बार कांग्रेस को युवराज की उम्र के बराबर भी सीटें नहीं मिलेगी और विपक्षी दल की भूमिका के लिए जरूरी सदन की सदस्य संख्या के 10 प्रतिशत जरूरी सीटें न मिल पाने के कारण विपक्ष निष्प्रभावी हो जाएगा। भले ही मोदी लोकतंत्र के लिए एक सशक्त विपक्ष की बात करते हो लेकिन 2014 से लेकर लोकसभा में नेता विपक्ष का न रहना और उनकी सोच यही बताती है कि वह विपक्ष विहीन सरकार चलाने के ही मंसूबों के साथ सत्ता में बने रहना चाहते थे। वरना संविधान में कहां लिखा है कि नेता विपक्ष के लिए सदन की सांसद संख्या के 10 फीसदी सांसद होना जरूरी है। संविधान तो सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को नेता विपक्ष होने का अधिकार देता है। खैर अब वर्तमान सरकार के सामने न कि सिर्फ मजबूत विपक्ष होगा बल्कि एक नेता विपक्ष भी बैठा होगा जिन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होगा और सत्ता को उसकी बात सुनना भी बाध्यकारी होगा। बीते 10 सालों में विपक्ष की किसी भी बात को न सुनने के आदी हो चुकी मोदी सरकार अब ऐसा नहीं कर सकेगी। यह देश के संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की दृष्टिकोण से कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक की बड़ी जीत है। बीते 10 सालों में सत्ता के लिए संवैधानिक संस्थाओं में मनमाने तरीके से नियुक्तियां और उनका अपने हित में दुरुपयोग करना भी नई सरकार के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि नेता विपक्ष की भूमिका भी अब उसमें रहेगी। इंडिया गठबंधन द्वारा चुनाव परिणाम के बाद अपनी चिंतन बैठक में जो फैसला लिया गया है कि वह सत्ता में आने के लिए जोड़—तोड़ का रास्ता नहीं अपनाएगी उसे जनता ने विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है और विपक्ष में ही बैठेगी उसकी सही और दूरदर्शी सच कही जा सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे का साफ कहना है कि जो हमारी नीतियों और सोच को ठीक मान कर हमारे साथ आना चाहते हैं उनका स्वागत है। जबकि भाजपा अपने सहयोगियों के साथ सत्ता पर इस सोच के साथ काबिज हुई है कि वह बहुत जल्द अपने संासदों की संख्या को बहुमत के लिए जरूरी 272 तक पहुंचा देगी जिससे सहयोगी दलों का दबाव खत्म किया जा सकेगा और वह पूर्ववर्ती सरकारों की तरह निष्कंटक फैसला ले सकेंगी। चर्चा है कि इंडिया ब्लॉक के सांसदों को तोड़ने की कोशिशें भी जारी है। अगर कल इंडिया के कुछ सांसद व दल भाजपा का दामन भी थाम ले तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि मौका परस्त नेताओं ने देश की राजनीति का बंटाधार किया है। सत्ता के साथ खड़े होने वाले नेताओं की न आज कोई कमी है न कल थी इसका कारण भले ही कुछ भी रहा हो। कुछ लोग जो यह मान रहे हैं कि यह मोदी सरकार कुछ दिनों की ही मेहमान है तो उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि वह गलतफहमी में है या फिर वह मोदी के बारे में कुछ नहीं जानते हैं।

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