सभी लड़ रहे हैं अस्तित्व की लड़ाई

0
68


लोकसभा चुनाव निपट चुका है। भाजपा और एनडीए ऐन केन प्रकारेण लगातार तीसरी बार सत्ता पर कब्जा बनाए रखने में भी सफल हो चुकी है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी सरकार के मंत्रियों के मंत्रालयों का बंटवारा भी कर चुके हैं। भले ही चुनावी नतीजे भाजपा के अनुकूल न आए हो लेकिन बदला कुछ नहीं। 2014 और 2019 की तरह मोदी और शाह उन्हीं पुराने तेवर और कलेवर के साथ काम करते दिखाई दे रहे हैं। इस चुनाव में संघ को जिस तरह राजनीति में घसीटा गया उसे लेकर सर संघ प्रमुख मोहन भागवत खासे आहत है। भाजपा और संघ के रिश्ते उस हद तक खराब हो चुके हैं कि जेपी नड्डा जिन्होंने यह कहा था कि अब भाजपा को संघ की जरूरत नहीं है। भाजपा इतनी बड़ी हो चुकी है कि वह अपनी हर लड़ाई खुद लड़ और जीत सकती है। भले ही इस चुनाव में अपने बूते 350 सीटें जीतने का दावा करने वाली भाजपा 250 भी सीटें न जीत सकी हो लेकिन उसके तीसरी बार सत्ता तक पहुंचने से भाजपा नेता या यूं कहें कि नरेंद्र मोदी व शाह अब संघ की बात न सुनने को तैयार है न मानने को। देश की जनता जो अपने इस जनादेश से यह साफ संदेश दे चुकी है कि उसे मोदी और शाह पीएम तथा होम मिनिस्टर के रूप में स्वीकार नहीं है वहीं संघ भी उन्हें इन पदों पर देखकर हैरान परेशान है। मोहन भागवत द्वारा मणिपुर हिंसा को लेकर सरकार को दी गई नसीहत के बाद यह साफ हो गया है कि संघ और भाजपा अब वैचारिक रूप से दो अलग—अलग दिशाओं में चल पड़े हैं। एक दूसरे के अस्तित्व को नकारते हुए दोनों ही अपने अस्तित्व को बचाए रखने की स्थिति में आकर खड़े हो चुके हैं। वहीं भाजपा जो अब अपने सहयोगियों को भी अपनी रणनीति से पछाड़ने के प्रयास कर रही है चंद्रबाबू नायडू तथा नीतीश कुमार और शिवसेना शिंदे को कितने दिन साथ रख पाएगी वर्तमान दौर का सबसे बड़ा सवाल हो गया है। मंत्रालय के बंटवारे में इन किंग मेकर कहे जाने वाले नेताओं को पीएम मोदी और शाह ने जिस तरह झुनझुना उनके हाथ में थमा दिया है उससे अब यह किंग मेकर भी संघ प्रमुख भागवत की तरह ही हैरान परेशान है। भाजपा नेताओं की जिस तानाशाही के खिलाफ यह चुनाव लड़ा गया था उन नेताओं का फिर सत्ता में पहुंचना और उनके वही रंग और तेवर भाजपा को कितने फायदेमंद और नुकसान देय होंगे तथा वह सत्ता में कितने समय तक बने रहेंगे इसे लेकर अभी से चिंतन मंथन और चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व न तो अपने चुनावी परिणाम की समीक्षा करने को तैयार है न ही आने वाले समय में भाजपा के भविष्य पर सोचने के लिए तैयार है उसके लिए सिर्फ सत्ता पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखना ही उसकी सर्वाेच्च प्राथमिकता है उनकी रणनीति में किसी के भी दबाव में काम न करने और साथ छोड़कर जाने का दबाव महसूस न करना ही है। उनकी सोच है कि उसके पास पर्याप्त संख्या बल है और इसे किसी भी सूरत में बनाए रखने का कौशल है। अभी कुछ खबरें यह भी आई थी कि बीजेपी इंडिया के सहयोगियों में सेंध लगा सकती है। निश्चित तौर पर भाजपा के पास वह तमाम हथकंडे है कि वह सत्ता में बने रहने के लिए कुछ भी कर सकती है। किसी के भी साथ होने न होने से उसे कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है यह बात मंत्रियों को मंत्रालयों के बंटवारे के बाद भी साफ हो चुकी है। लोकतंत्र के साथ तानाशाही का यह रवैया देश की राजनीति और भाजपा को किस तरफ ले जाएगा और इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे इन सभी सवालों का जवाब आने वाला समय ही देगा। अभी तो क्या विपक्ष क्या सत्ता पक्ष और क्या आरएसएस सभी अपने—अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जंग लड़ते नजर आ रहे हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here