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लोकतंत्र की जीत का सवाल

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वर्तमान लोकसभा चुनाव का जिसके बारे में यह कहा जाता रहा है कि यह चुनाव राजनीतिक दलों के बीच लड़ा जाने वाला चुनाव नहीं है यह चुनाव सत्ता और जनता के बीच होने वाला चुनाव है मतगणना वाले दिन तक पहुंचते पहुंचते ऐसी स्थिति में पहुंच जाएगा कि जहां एक तरफ पक्ष और विपक्ष दोनों ही खेमे जीत के जश्न की तैयारियों में जुटे होंगे तथा चुनाव आयोग मतगणना से एक दिन पूर्व अपनी कमियों पर उठाये जा रहे सवालों का जवाब देने को घंटो लंबी पत्रकार वार्ता कर इस बात की आशंका जता रहा होगा कि चुनाव परिणाम के बाद देश में वायलेंस (बलवों) की स्थिति बन सकती है। देश के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि मतदान निपटने के बाद भी यूपी, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश सहित तमाम राज्यों से पैरामिलिट्री फोर्स को वापस नहीं बुलाया गया जिससे किसी भी राज्य में अगर कानून व्यवस्था बिगड़ने जैसे हालात पैदा होते हैं तो राज्य सरकार इन सुरक्षा बलों का इस्तेमाल कर सके। सवाल यह है कि यह हालत उस देश में जहां के लोकतंत्र को विश्व का सबसे पुराना और मजबूत लोकतंत्र बताया जाता हो वहीं चुनाव आयोग से लेकर मीडिया तक जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता हो सभी कुछ संदेह के घेरे में आ गया है। यह बेवजह नहीं हुआ है और न एक दिन में ऐसे हालात पैदा हुए हैं। मतगणना से पूर्व सभी राजनीतिक दलों द्वारा अपने कार्यकर्ताओं व नेताओं को अंतिम वोट की गिनती तक मतगणना केंद्रो व पार्टी के मुख्यालय और सड़कों पर रहने के निर्देश दिए जा चुके हैं। किसी भी स्तर पर होने वाली गड़बड़ी को बर्दाश्त न करने की चेतावनी कई पार्टियों के अध्यक्षों द्वारा इस अंदाज में दी गई है कि वह लोकतंत्र को बचाने के लिए जनता के साथ किसी भी हद तक जा सकते हैं। अधिकारियों तक को उन्होंने कह दिया है कि वह इस बात को समझ ले कि जनता से बड़ा कोई नहीं है। 1 जून को आए एग्जिट पोल के बाद मीडिया जिस तरह से सत्ता के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है उसकी विश्वसनीयता भी अब दांव पर लगी हुई है। देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब मीडिया ने अपने एग्जिट पोल में 100 फीसदी सत्ता के पक्ष में आंकड़े पेश किए हैं। जबकि जमीनी हकीकत 2014 या 2019 वाली नहीं है। सरकार ने 400 पार का नारा दिया तो एग्जिट पोल ने भी 400 पार कर दिया। चुनाव आयोग ने चार दिन में मतदान प्रतिशत बताने की बात कहीं जरूर है लेकिन उसने 11 दिन में मतदान प्रतिशत क्यों बताया नहीं या फिर दूसरे तीसरे चरण में चार दिन और 2 दिन में ही मतदान कैसे बता दिया अंतिम चरण का मतदान 1 जून को हुआ और मतदान प्रतिशत 5 जून को यानि कल चुनाव परिणाम आने के बाद पता चलेगा ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका पर संदेह क्यों नहीं किया जाना चाहिए। सच बात यह है कि यहां दाल में काला नहीं है अपितु पूरी दाल ही काली है। जिसके कारण ऐसे हालात पैदा हुए हैं कि चुनाव कोई भी हारे या जीते और सरकार किसी की भी बने विश्वसनीयता सभी की समाप्त हो चुकी है। लोकतंत्र तभी तक सुरक्षित रह सकता है जब तक जनता की जीत होती है। सत्ता या प्रशासन और स्वात्तधारी संस्थाएं अगर लोकतंत्र को अपनी सहूलियत के हिसाब से मैनेज करने लगे तो उसे आप लोकतंत्र नहीं कहते है। आज देश के लोकतंत्र के सामने यही सबसे बड़ा सवाल है।

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