नौ दिन चले अढ़ाई कोस

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उत्तराखंड राज्य को विकसित और आदर्श तथा सर्वाेत्तम राज्य बनाने के नेताओं के दावे भले ही भाषणों में कितने भी मनमोहक लगते हो लेकिन अपने श्ौशव काल को पार कर जवानी की दहलीज पर खड़े इस राज्य ने वास्तव में कितनी तरक्की की है इसका अनुमान राज्य की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति से लगाया जा सकता है। राज्य के पलायन के बारे में जब भी बात होती है तब यही कहा जाता है कि जब तक पहाड़ की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त नहीं किया जाएगा तब तक पलायन को रोका नहीं जा सकता है। अभी केंद्रीय शिक्षा मंत्री उत्तराखंड के दौरे पर आए थे तथा 141 पीएम श्री स्कूलों की सौगात राज्य को देकर गए थे। लेकिन किसी ने इस दौरान राज्य की बेसिक शिक्षा और विघालयी शिक्षा की वास्तविक स्थिति और स्कूलों की दिशा और दशा क्या है इस पर कोई सवाल नहीं उठाया, राज्य के स्कूलों में राज्य गठन के बाद ताले क्यों पड़ रहे हैं तथा राज्य में फर्जी दस्तावेजों से शिक्षक बनने वालों का क्या हुआ? इस पर किसी को गौर करने की आज जरूरत नहीं समझी जा रही है। 2021 में बच्चों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा मुहैया करने के लिए अटल उत्कृष्ट स्कूलों को शुरू किया गया था। लेकिन आज इन स्कूलों को बंद करने की नौबत आ गई है। माना जा रहा था कि इन स्कूलों में राज्य के आम लोगों के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सकेगी लेकिन इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सीबीएसई बोर्ड के अनुकूल प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं वहीं शिक्षक भी इनका विरोध करता आ रहा है इसलिए अब सरकार इन 189 अटल उत्कृष्ट विघालयों को समाप्त कर इन्हें उत्तराखंड बोर्ड में शामिल करने की तैयारी कर रही है। जब राज्य में अटल उत्कृष्ट विघालयों का यह हश्र होने वाला है तो फिर इन 141 पीएम श्री स्कूलों से शिक्षा का क्या भला हो सकेगा यह सहज समझा जा सकता है। लेकिन राज्य के नेता और लोग पीछे वाली समस्याओं को पीछे छोड़ कर आगे की ओर भागते रहने में अपना वह राज्य का हित देखते रहे हैं। जिसके कारण स्थिति 23 साल बाद 9 दिन चले अढ़ाई कोस वाली ही बनी हुई है और शिक्षा के क्षेत्र में तमाम कोशिशोंं के बाद भी नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है। ठीक वैसे ही स्थित राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की भी है। भले ही राज्य में कई मेडिकल कॉलेज और एम्स की स्थापना हो गई हो लेकिन राज्य के जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो में आज तक न तो विशेषज्ञ डॉक्टर हैं और न ही प्रयाप्त स्वास्थ्य सुविधा और दवाए, आज भी मामूली से मामूली बीमारी के इलाज के लिए पहाड़ के लोगों को दून और ऋषिकेश आना पड़ता है या फिर चंडीगढ़ और दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती है। अभी बीते कल एक कार्यक्रम में दिल्ली में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चार धाम यात्रा पर 40 लाख लोगों के आने की जानकारी जितने गर्व के साथ कह रहे थे कि उत्तराखंड में चार धाम है और मुझ जैसा मुख्य सेवक है तो लोग सोच रहे थे कि अगर 40 लाख यात्री चार धाम पहुंचे तो इसमें सरकार का क्या कमाल है सच भी यही है कि आज की स्थिति में कोई भी पर्यटक इन चारों धामों की सड़कों की स्थिति को देख ले तो वह अपने आपको कोसता ही नजर आएगा। यह हाल तब है जब डबल इंजन की सरकार ने चारधाम ऑल वेदर रोड का निर्माण कर दिया है। राज्य गठन के बाद भले ही राज्य में कुछ भी बदला हो लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के हालात में कोई खास बदलाव नहीं है यही कारण है कि राज्य से पलायन भी जारी है।

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