बैंक प्रणाली में सुधार जरूरी

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एक जमाना था जब साहूकारों द्वारा आम आदमी को कर्ज देकर कर्ज न चुका पाने की स्थिति में उनकी जमीन और घर बार तक हड़प लिए जाते थे। ब्याज पर ब्याज और फिर मनमाना ब्याज वसूल करने का काम अब साहूकारों के बाद बैंकों द्वारा किए जाने लगा है। जो लोग बैंक से कर्ज लेते हैं उन्हें यह भली—भांति पता है कि बैंक का कर्जा न चुकाने पर उन्हें किस किस तरह के उत्पीड़न और परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। ग्राहकों या उपभोक्ताओं को यह भी पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि उन्होंने जो कर्ज लिया था उस बैंक द्वारा किस किस कारण से कितने तरह का अधिभार जोड़ दिया गया है। कई बैंक ऐसे हैं जो समय पर कर्ज न चुकाने वालों से ब्याज पर भी ब्याज वसूलते हैं। निजी क्षेत्र के बैंक और वित्तीय संस्थाओं द्वारा तो ब्याज दरें मनमाने तरीके से तय की जाती हैं। हालांकि बैंक ग्राहकों को इस लूटपाट और उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने के लिए बीते पांच दशक से सुधार की प्रक्रिया जारी है लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि अभी तक देश में एक पारदर्शी बैंकिंग व्यवस्था नहीं बनाई जा सकी है। बीते कल आरबीआई द्वारा कर्ज पर बैंकों द्वारा लगाई जाने वाले दंडात्मक ब्याज के लिए नई संशोधित नियमावली जारी की गई है। इन संशोधनों के बाद बैंक और गैर बैंकिंग वित्त कंपनियां कर्ज भुगतान में चूक के मामलों में ग्राहकों से दंडात्मक ब्याज नहीं वसूल सकेंगे। निश्चित तौर पर इस नए नियम के लागू होने से छोटे और आम उपभोक्ता या ग्राहकों को बैंकों की अनावश्यक वसूली से बड़ी राहत मिल सकती है। आरबीआई का कहना है कि दंडात्मक ऋण व्यवस्था ऋण वसूली में अनुशासन की भावना बनाए रखने के लिए है न कि बैंकों द्वारा अपने राजस्व बढ़ोतरी का माध्यम है। खास बात यही है कि तमाम बैंकों व वित्तीय संस्थाओं ने इसे अपनी राजस्व वसूली का माध्यम बना लिया गया है जिस पर प्रतिबंध लगाया जाना जरूरी हो गया। आरबीआई का कहना है कि ब्याज को ग्राहकों की अग्रिम किस्तों में जोड़ा जाना गलत है। दंडात्मक ब्याज को आरबीआई ने भले ही सही ठहराया हो लेकिन बैंकों की जो परिपाटी है ब्याज पर भी ब्याज वसूलने की वह उचित नहीं है। आरबीआई का यह फैसला भले ही उचित सही लेकिन इस उचित फैसला को लागू करने के लिए जो 1 जनवरी 2024 की तारीख तय की गई है इस विलंब को कतई भी सही नहीं ठहराया जा सकता है जब भी किसी सरकारी संस्थान या सरकारी कर्मचारियों के हित और संरक्षण में कोई फैसला किया जाता है तो तुरंत ही लागू कर दिया जाता है फिर आम जनमानस के हित में लिए गए इस फैसले को लागू करने के लिए इतना लंबा इंतजार क्यों कराया गया है यह समझ से परे है। अच्छा होता कि आरबीआई द्वारा इसे तत्काल प्रभाव से ही लागू कर दिया गया होता। आमतौर पर यही होता है कि आरबीआई द्वारा इधर ब्याज दरें बढ़ाई जाती है उधर बैंक भी उपभोक्ता के लोन की ईएमआई में बढ़ोतरी कर देते हैं तथा इसके बारे में ग्राहकों को बताना भी बैंक जरूरी नहीं समझते। आरबीआई का कहना है कि बैंकों को उचित नीतिगत ढांचा बनाने की जरूरत है। सच यह है कि वर्तमान डिजिटल बैंकिंग के इस दौर में बैंकिंग प्रणाली को अभी और भी अधिक पारदर्शी बनाये जाने की जरूरत है।

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