भ्रष्टाचार का लाइलाज कैंसर

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उत्तराखण्ड राज्य में सरकार की सख्ती और कोशिश के बाद भी जिस तरह से भर्तियों में धांधली का व्रQम जारी है वह यह बताने के लिए काफी है कि नकल माफिया किस हद तक निरंकुश हंै और उनकी जडें कितनी गहरी हैं। भले ही मुख्यमंत्री धामी द्वारा इसे कैंसर की समाप्ति तक आप्रेशन जारी रखने की बात की जा रही हो अथवा सख्त नकल रोधी कानून लाने के प्रयास किये जा रहे हों लेकिन उनके सभी प्रयासों का अब तक जो नतीजा है वह ढाक के तीन पात ही हैं। यूकेएसएसएससी की परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक के तमाम मामले उजागर होने के बाद सरकार ने सारी परीक्षाएं उत्तराखण्ड लोक सेवा आयोग से कराने का फैसला किया था लेकिन लेखपाल—पटवारी परीक्षा जो अभी विगत कुछ समय पहले ही कराई गयी थी उसका पेपर लीक होने से यह सवाल खडा हो गया कि अब भर्ती परीक्षाएं कराने की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए? बीते साल जब जेई एई की परीक्षाओं के पेपर लीक होने के खुलासे के बाद यह साफ हो गया कि उत्तराखण्ड लोक सेवा आयोग द्वारा करायी जाने वाली परीक्षाओं में भी वैसे ही धांधली होती आई है जैसे अधीनस्थ चयन आयोग की परीक्षाओं में होती रही थी भर्तियों में भ्रष्टाचार का यह कैंसर कितना विकराल रूप ले चुका है इस बात को समझने के लिए यह बात ही काफी है कि राज्य में अब तक हुई एक भी भर्ती ऐसी नहीं है जिसमें धांधली न हुई हो। खास बात यह है कि यह धांधली किसी एक व्यक्ति या संस्था ने नही की है बल्कि इसे एक संगठित गिरोह द्वारा अंजाम दिया गया है जिसमें सत्ताधारी दलों के नेताओं और आयोगों के अधिकारियों से लेकर अन्य तमाम प्रभावी लोगों की भूमिका रही है। बीते 15 सालों से चल रहे इस गोरखधंधे से लोगों ने हजारों, करोडों की कमाई की है और आर्थिक रूप से इतने मजबूत हो चुके हैं कि उन्हें कोर्ट कचहरी के खर्चे और उनकी सम्पत्तियों के कुर्क होने से भी कोई प्रभाव नहीं पड रहा है। खास बात यह है कि अब तक इस तरह के अपराधों के लिए सख्त कानून ना होने का भी इन नकल माफिया द्वारा भरपूर फायदा उठाया जा रहा है। एसआईटी और पुलिस उन्हेंं गिरफ्तर कर जेल भेज रही है तो वह चंद दिनों में जमानत पर बाहर आ रहे हैं और सरकार को ठेंगा दिखा रहे हैं। इन भर्ती घोटालों में अब तक हाकम सिंह और नितिन चौहान के रूप में भाजपा नेताओं के नाम सरगना के तौर पर सामने आ चुके हैं जिसके कारण भाजपा में बैचेनी का माहौल है। अब इन दागों को धोने का धामी द्वारा जितना भी प्रयास किया जाय दाग और भी गहरे होते जा रहे हैं। बेचारे इस राज्य के युवा बेरोजगारों की यह बदकिस्मती ही है कि उनके हक पर डाका डालने का काम उनके अपनों और उनकी सरकार द्वारा किया जाता रहा है। बात सीधी भर्तियों की हो या फिर बैंक डोर भर्तियों, नौकरियों की, जो लूट उत्तराखण्ड में हुई और युवाओं के भविष्य के साथ जिस तरह का खिलवाड हुआ है वह न सिर्फ दुखद है बल्कि चिंताजनक है। भ्रष्टाचार का यह मंजर सही मायने अब एक लाइजाल बीमारी बन चुकी है।

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