बीते रोज उत्तराखण्ड की कैबिनेट की बैठक में राज्य को नशा मुक्त किये जाने की दिशा में एक और कदम उठाते हुए एक प्रस्ताव को पारित कर एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स के स्थायी ढांचे को मंजूरी प्रदान करने के साथ ही इसमें 22 पदों के सृजन किये जाने को मंजूरी दे दी गयी है। सोचनीय सवाल यह है कि क्या सिर्फ कार्यालयों में बैठ कर राज्य को नशा मुक्त किया जा सकता है? उत्तराखण्ड राज्य इन दिनों नशे की पूरी तरह गिरफ्त में आ चुका है। जबकि राज्य की सरकारें पिछले 12—15 वर्षो से राज्य को नशा मुक्त राज्य बनाने का दावा करती रही है। अब तो पुलिस प्रशासन की ओर से जब भी मीडिया को किसी भी नशा तस्करों को गिरफ्तार करने की जानकारी दी जाती है तो उस प्रेस विज्ञप्ति में भी यह दावा किया जाता है कि राज्य को नशा मुक्त बनाने की दिशा में पुलिस द्वारा यह कार्य किया गया है। क्या राज्य को नशा मुक्त बनाने का सिर्फ यही तरीका है। जबकि उत्तराखण्ड के निवासी यह तक जानते है कि यहंा राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में जहंा भांग की खेती कर चरस बनायी जाती है तो वहीं यूपी के बरेली सहित अन्य जिलों से स्मैक व हेरोइन की तस्करी कर उत्तराखण्ड पहुंचायी जाती है। जब यह बात आम नागरिको को पता है तो क्या यह बात शासन प्रशासन को नही पता है, यह सोचनीय सवाल है? जबकि शासन प्रशासन यह सब जानते हुए भी मौन है। शासन—प्रशासन को अब यह सोचना होगा कि राज्य को नशामुक्त बनाने के लिए उसे धरातल पर कार्यवाही करने की जरूरत है नहीं तो सिर्फ कागजो व कार्यालयों में बैठ कर राज्य को कभी भी नशामुक्त राज्य नहीं बनाया जा सकेगा।


