देश की अर्थव्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। बेरोजगारी और महंगाई अपने चरम पर है, देश भर में छोटे व्यवसाय और उघोग ठप हो चुके हैं। अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं तथा गरीब और अधिक गरीबी में धस्ते जा रहे हैं। बाजार की स्थिति डावंाडोल है। बैंकों के पास पैसा नहीं है और वह ऋण देने से कतरा रहे है। इस बार दीपावली में बाजारों में जो सुस्ती देखी गई उसका अहम कारण यही था कि आम आदमी जब जेब मैं पैसा नहीं है तो वह क्या खरीदेगा? घर में त्यौहार की रस्म अदायगी भर हो जाए बस इसमें ही उसकी तसल्ली थी। आम आदमी अगर बचत नहीं कर पाएगा तो फिर बैंकों में पैसा कहां से जमा करेगा। ऐसे में बैंकों में पैसे की कमी होना स्वाभाविक है। क्योंकि बैंकिंग का सिस्टम लोगों की जमा बचत पर चलता है। अमीरों के पास पैसा है तो वह इस पैसे को ऐसी संपत्तियों को बनाने में खर्च कर रहे हैं जहां से उन्हें अच्छा रिटर्न मिल सके। रियल एस्टेट और सोना चांदी में निवेश उन्हें सुरक्षित लग रहा है। जहां 2 करोड़ के प्लाट की कीमत 1 साल में 3 करोड़ हो जाती है या फिर सोना चांदी जहां 2 करोड़ की कीमत ढाई करोड़ हो जाती है। अभी दीपावली पर हमने देखा कि बाजार में चांदी पूरी तरह से गायब हो गई। इसके दाम एक लाख 65000 प्रति किलो तक जा पहुंचे। लंदन जो विश्व का सबसे बड़ा चांदी बाजार है, यह खबर आई की चांदी का स्टॉक सिर्फ 4665 टन ही बचा है जबकि खपत 26000 टन प्रतिदिन है। ऐसी स्थिति में भारत को लंदन से चांदी नवंबर तक नहीं बेची जाएगी। सवाल यह है कि आखिर देश के इस हालात के लिए कौन जिम्मेवार है और क्यों इस तरह के हालात देश के सामने पैदा हो गए हैं। क्यों आज देश के अर्थशास्त्री और जानकार लोग पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को याद कर रहे हैं जिन्हें वर्तमान मोदी सरकार पानी पी पीकर कोसती रही है कि उन्होंने तो देश का सोना तक गिरवी रखवा दिया था। निश्चित रूप से इस आर्थिक संकट के लिए और कोई नहीं केंद्र की वह भाजपा सरकार ही जिम्मेदार है जिसने देश के एमएसएमई सेक्टर पर ध्यान नहीं दिया, जहां से रोजगार के अवसर पैदा होते थे लोगों को काम मिलता था और उनकी जेब में पैसे आते थे और उस पैसे के बाजार में सर्कुलेशन से व्यवसाय को बढ़ावा मिलता था। अकेले इस सेक्टर की तबाही ने देश की बाजार व्यवस्था की रीड को ही तोड़ कर रख दिया। लोगों को बेरोजगारी की भटृी में झोंक दिया गया। अभी प्रधानमंत्री मोदी बिहार के चुनाव प्रचार में युवाओं को मोबाइल डाटा सस्ता करने का वायदा करते देखे गए, वह कहते हैं कि इन दिनों बिहार के युवा खूब रील बना रहे हैं जिससे उन्हें खूब पैसा भी कमाने का मौका मिल रहा है। धन्य है यह अर्थशास्त्र जो युवाओं को रील से पैसा कमाने की सलाह देता है। अभी पिछले दिनों भाजपा के नेताओं ने युवाओं का यह कहकर मजाक बनाया था कि पकोड़े तलना भी तो रोजगार है। खैर असल बात यह है कि इस कालखंड में पूंजी पतियों और उघोगपतियों द्वारा अपनी पूंजी को बढ़ाने के लिए उन उत्पादकता वाले क्षेत्रों में निवेश किया जा रहा है और इस दौड़ में अब बैंक भी शामिल हो चुके हैं। पैसों का अब एमएसएमई को ऋण देने में कोई रुझान नहीं है। क्योंकि इसमें रिटर्न सीमित है और जोखिम अधिक है। सरकार को अब 14—15 साल बाद आईटीआई यूनिटों के नवीनीकरण की याद आई है। जहां से स्किल्ड लेबर मिलती थी लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के डायलॉग कि वह हमारा क्या कर लेंगे जी। हम तो फकीर है झोला उठा कर चल देंगे। सवाल पीएम के झोला उठा कर चल देने का नहीं है सवाल यह है कि अब इस देश का क्या होगा और युवाओं तथा बेरोजगार और गरीबों का क्या होगा जिन्हें आपने अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया था।




