सत्ता सदैव किसी के पास नहीं रहती है सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठने वाले व्यक्ति को इसका बखूबी ज्ञान होता है। लेकिन सत्ता पर जब कोई नया व्यक्ति आसीन होता है तो उसके द्वारा इस सत्य को नजर अंदाज कर दिया जाता है और वह अपनी इच्छानुकूल तरीके से काम करना शुरू कर देता है। 2014 के लोकसभा चुनाव का वह दौर हर एक व्यक्ति को याद होगा जब उसने अपनी गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से मुक्ति का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने का मौका दिया था, 11 साल बाद भी वह सत्ता पर काबिज है। इन 11 सालों में उनकी सरकार द्वारा क्या—क्या अहम फैसले किए गए और उन फैसलों से देश और समाज को कितना फायदा हुआ और कितना नुकसान, बीते 1 साल से इस मुद्दे पर गहन चिंतन और मंथन जारी है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इसे भले ही अमृत काल की संज्ञा दी जा रही हो लेकिन देश के समाजशास्त्री और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बीते 10 सालों में देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था बर्बादी के उस मुकाम पर लाकर खड़ी कर दी गई जिसकी भरपाई आने वाले चार दशकों में भी नहीं की जा सकेगी। केंद्रीय सरकार द्वारा जिस तरह से नोटबंदी, जीएसटी, 3 नए कृषि कानून और सेना में अग्नि वीर भर्ती की योजना लाई गई वह उसके आत्मघाती फैसलों में गिने जाते हैं। यही नहीं केंद्र सरकार ने जिस तरह संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियों को सत्ता के अधीन लाया जा रहा है उससे देश के लोकतंत्र का स्वरूप बदलने की कोशिश की गई है उन्हें आम आदमी से लेकर जानकार लोग भी उचित नहीं मान रहे हैं। न्यायपालिकाओं से लेकर निर्वाचन आयोग तक की कार्यप्रणाली आज अगर सवालों के घेरे में है तो वह बेवजह नहीं है। सरकार ने इन 11 सालों में नया क्या किया, क्या नया बनाया यह एक अहम सवाल है जिसकी गूंज हमें संसद से सड़कों तक सुनाई देती रहती है। योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग कर दिए जाने या पीएमओ का नाम बदलकर सेवा तीर्थ करने तथा मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं का नाम जी राम जी करने से देश का क्या भला होने वाला है इसे सत्ता में बैठे लोग ही समझ सकते हैं। 2005 में शुरू की गई जिस मनरेगा योजना से देश के ग्रामीण परिवेश को सबसे अधिक सहारा मिलता था क्योंकि इस योजना के तहत देश के असंगठित क्षेत्र के 12 से 14 करोड लोगों को यह योजना 100 दिन के रोजगार की गारंटी देती थी जिसके माध्यम से यह गरीब लोग 370 रुपए प्रतिदिन कमा लेते थे अब सरकार इसका नाम ही नहीं बदल रही है बल्कि इसे समाप्त कर देना चाहती है। इनके नियमों में बदलाव कर के भले ही कार्य दिवस 100 से 140 दिन करने की बात कही जा रही है लेकिन हकीकत यह है कि वर्तमान में सरकार मनरेगा मजदूरों को 100 दिन भी काम नहीं दे पा रही है और उन्हें 60 से 70 दिन ही काम मिल पा रहा है। सरकार पहले इस योजना में 90 फीसदी खर्च खुद उठती थी तथा राज्य सरकारों को 10 फीसदी ही देना पड़ता था लेकिन केंद्र सरकार ने अब अपनी भागीदारी को घटाकर यदि 60 फीसदी कर दिया है तो वह भला इन मनरेगा मजदूरों का कैसे कल्याण कर रही है। सरकार की मंशा अब ग्रामीण मजदूरों से यह मजदूरी का हक भी छीनने की तैयारी कर ली गई है क्योंकि राज्य सरकारों की कमाई के साधनों को वह पहले ही कम कर चुकी है सरकार को पता है कि राज्य 40 फीसदी मजदूरी नहीं दे पाएंगे और यह योजना बंद हो जाएगी। लेकिन कांग्रेस इसे पुराने स्वरूप में बहाल रखने की मांग को लेकर राष्ट्रीय व्यापी आंदोलन छेड़ने का ऐलान कर चुकी है। देखना होगा कि क्या कृषि कानून की तरह विपक्ष इस फैसले को वापस लेने पर बाध्य कर पाता है या नहीं। केंद्र सरकार ने 10 सालों में जो राजनीति, समाज व अर्थव्यवस्था का इतिहास लिखा उस पर उसे गौर करने की जरूरत है।




