मनरेगा, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नाम बदल दिया गया है। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा अब इस योजना का नाम बदलकर पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना कर दिया गया है? 2014 में सत्ता में आने के बाद से लेकर आज तक केंद्र की सरकार द्वारा जनकल्याण के लिए चलाई जाने वाली कितनी योजनाओं के नाम बदले गए हैं और कितनी नई योजनाएं लाई गई है इसका पूरा लेखा—जोखा लेकर आज कांग्रेस की प्रवक्ता श्रीनेत्र मीडिया के सामने आई तो उन्होंने दर्जन भर से अधिक योजनाओं की फेरहिस्त सामने रख दी और मोदी सरकार से सवाल पूछा कि क्या मोदी सरकार यह बताएगी कि उसने अपने 14 साल के कार्यकाल में अपनी कोई नई योजना भी अब तक लांच की है। अगर की है तो चार योजनाओं के नाम बताएं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि उन्हें यह भी बताना चाहिए कि कांग्रेस द्वारा ग्रामीणों के रोजगार की लाइफ लाइन बन चुकी इस योजना का विरोध करने वाली भाजपा इस योजना को अब चलाते रखने पर क्यों मजबूर है? सरकारी संस्थाओं से लेकर सड़कों और योजनाओं का नाम बदलकर यह गिनने वाली इस सरकार को यह बताना चाहिए कि इससे देश के लोगों को क्या लाभ हो रहा है। अपने आदर्श व्यक्तियों या प्रधानमंत्री के नाम से चलाई जाने वाली इन योजनाओं के नाम बदलने वाली सरकार के पास अपनी भी कोई विकास की सोच और उसका रोड मैप है। वह कहती है इस सरकार द्वारा नाम बदलने की राजनीति के अलावा करने के लिए क्या और कोई भी काम नहीं है। उल्लेखनीय बात यह है कि जनकल्याण की इन योजनाओं के लिए सरकार द्वारा समय से धन तो उपलब्ध कराया नहीं जा पा रहा है अकेले पश्चिम बंगाल का केंद्र सरकार पर मनरेगा का 52000 करोड़ रुपया बकाया है। टीएमसी की नेता सारिका घोष का कहना है कि सरकार वंदे मातरम पर संसद में चर्चा कराकर राष्ट्रीय गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चटृोपाध्याय और राष्ट्रगान के रचयिता रविंद्र नाथ टैगोर का पहले ही अपमान कर चुकी है अब एक बार फिर मनरेगा का नाम बदलकर सरकार बंगाल का अपमान करने जा रही है। उनका कहना है कि मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा की उपाधि खुद रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा दी गई थी। मनरेगा से महात्मा शब्द को हटा कर वह एक बार फिर बंगाल का अपमान करने का काम कर रहे हैं। कुछ लोग तो सोशल मीडिया पर यहां तक सरकार का मजाक उड़ाते हुए लिख रहे हैं कि कहीं मोदी ने अपने पूज्य आसाराम बापू के नाम से बापू शब्द लेकर इस योजना का नाम पूज्य बापू तो नहीं किया गया है। सरकार द्वारा देश भर में लंबे समय से गुलामी की निशानियों को हटाने की आड़ में नाम बदलने का काम किया जा रहा है। रेलवे स्टेशनों से लेकर गली मोहल्ले और चौक चौराहे तथा सड़कों तक के नाम बदले जा रहे हैं। इस काम में सिर्फ केंद्र की भाजपा सरकार ही नहीं लगी है जो कभी योजना आयोग का नाम बदलती है तो कभी मनरेगा का इस काम को भाजपा शासित सरकारों के मुख्यमंत्रियों द्वारा भी व्यापक स्तर पर किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलते हैं तो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी अभी बीते दिनों कुछ स्थानों के नाम बदलने का फैसला किया गया था जिसमें मियां वाला का नाम बदल दिया गया था लेकिन जन विरोध के बाद यह फैसला वापस ले लिया गया था। दरअसल भाजपा के नेता वही करते हैं जो उनका राष्ट्रीय नेतृत्व कर रहा होता है। भाजपा के पास अपने महान नेताओं या महापुरुषों के कोई नाम नहीं है इसलिए वह कभी सरदार पटेल को कभी पंडित दीनदयाल उपाध्याय तथा अटल बिहारी वाजपेई के नाम का इस्तेमाल कर लेते हैं। सच यही है जैसे अभी संसद में राष्ट्रगीत पर चर्चा के दौरान भाजपा से पूछा गया था कि वह संघ या भाजपा के चार नेताओं के नाम बताएं जिन्होंने वंदे मातरम गाया हो तो उन्हें जवाब देते नहीं बना था। यही कारण है कि उनके पास न अपना कोई काम है और न ही कोई नाम है। इसलिए वह नाम बदलने की राजनीति के सहारे ही अपनी राजनीति चलाने पर विवश है। मोदी के कार्यकाल के तमाम फैसले इस बात की गवाही देते हैं।


