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ड्रामा और डिलीवरी वाली राजनीति

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कल संसद के शीतकालीन सत्र के आगाज के पहले ही दिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद की सीढ़ियों पर खड़े होकर जिस तरह अपने चिरपरिचित अंदाज में अपनी बात रखी उनके इस संबोधन को जिसने भी सुना होगा उसे यह बात आसानी से समझ आ चुकी होगी कि वर्तमान समय में देश की सरकार और संसद की कार्यवाही किस तरह से चल रही है और चलाई जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में जिस तरह से विपक्ष को ड्रामेबाज बताते हुए यह नसीहत दी गई कि नारेबाजी और ड्रामेबाजी के लिए पूरा देश खाली पड़ा है जहां चुनाव हार कर आए वहां जाकर करें या फिर जहां चुनाव हारने वाले हैं वहां चले जाएं संसद में सिर्फ डिलीवर होना चाहिए। उन्होंने अपनी कहने के लिए पहली बार संसद में आए सांसदों को अपनी बात रखने का अवसर देने की बात कही और विपक्ष पर संसद में हंगामा करने तथा सदन की कार्यवाही न चलने देने का ठीकरा फोड़ा गया। सत्ता का अहंकार और सिर्फ चुनावी जीत को ही राजनीति मान बैठे प्रधानमंत्री मोदी का यह संबोधन एक प्रधानमंत्री के संबोधन जैसा कतई नहीं है। विपक्ष के प्रति जिस तरह के नफरती भाव उनके मन में है वह इस बात को स्पष्ट करते हैं कि संसद सत्र में हंगामे के लिए विपक्ष नहीं सत्ता पक्ष ही जिम्मेदार है। सत्ता पक्ष विपक्ष के सवालों से बचने के लिए संसद सत्र को नहीं चलने देना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी जिन्होंने बीते 11 सालों में कोई एक भी पत्रकार वार्ता न करके मीडिया के सवालों का जवाब देने की जरूरत नहीं समझी और न ही इस बात की कोशिश की कि मीडिया के सवालों के जरिए वह आम आदमी की सोच और समस्याओं को समझे वह सदन में भी अब विपक्ष की बात या उसके द्वारा उठाए जाने वाले सवालों को सुनना नहीं चाहते हैं उन पर चर्चा तो बहुत दूर की बात है। विपक्ष द्वारा अब तक लोकसभा में 84 तथा राज्यसभा में 144 बार विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के लिए प्रस्ताव नोटिस दिए गए हैं लेकिन लोकसभा अध्यक्ष व राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा किसी भी एक प्रस्ताव पर चर्चा कराने की अनुमति नहीं दी गई इस बात का प्रमाण है कि सरकार विपक्ष के सवालों का जवाब देना ही नहीं चाहती। विपक्षी सांसदों की बात संसद में सरकार सुनने को तैयार नहीं है। मीडिया के सवालों को अहमियत नहीं है तथा सिर्फ अपने मन की बात कहनी है तथा मन चाहा ही करना है तो यह भला काहे का लोकतंत्र है। जिन हथकंडों से सरकार चुनाव जीत रही है वही बस उसकी राजनीति और उद्देश्य है तो उसे लेकर विपक्ष को हंगामा करना ही चाहिए। विपक्ष ने कई बार कुछ अहम अवसरों पर विशेष सत्र बुलाकर चर्चा करने की मांग की है। उसे भी हमेशा अस्वीकार कर दिया गया है। ऑपरेशन सिंदूर पर सत्ता पक्ष विशेष सत्र बुलाने और चर्चा कराने को तैयार नहीं हुआ था। अब लोगों ने मान लिया है कि देश की सरकार न तो संविधान के अनुकूल चल रही है न लोकतांत्रिक तौर तरीको में, देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसदों को किस बात की नसीहतें दे रहे हैं यह तो वही जाने, हां अब वह खुद संसद जाने से बचते दिख रहे हैं। विपक्ष एस आई आर के दौरान हो चुकी 40 मौतो के मुद्दे पर सदन में सरकार से चर्चा करने तथा गिरती रुपए की कीमत पर सवाल करना चाहता है लेकिन सुनने वाला सुनने को ही तैयार नहीं है। राजनीति का ऐसा ड्रामा और डिलीवरी जिसका जिक्र खुद पीएम मोदी और उनके तीन राज्यसभा सांसदों ने किया जिन्हें यही पता नहीं था कि उन्हें किस मुद्दे पर बोलना है। संसद के इतिहास में न पहले कभी देखा गया है न भविष्य में शायद कभी देखने को मिलेगा। फिर इस सरकार और लोकतंत्र को क्या कहा जा सकता है।

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