किसी भी राज्य और समाज का विकास उसकी राजनीतिक दिशा व दशा से ही तय होता है। यह एक सर्वमान्य सत्य है। शासन का हर एक फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि सत्ता का हर फैसला सीधे—सीधे राष्ट्र व समाज हितों से जुड़ा है। जब किसी भी सरकार द्वारा किए जाने वाले फैसले सत्ता में बने रहने के लिए किए जाने लगे तो वहां किसी भी विधान और संविधान की कोई अहमियत नहीं रह जाती है और ऐसी पथ भ्रष्ट राजनीतिक स्थिति न समाज के लिए और न किसी राष्ट्र के लिए कल्याणकारी हो सकती है। बिहार चुनाव के बाद देश में जिस तरह की उथल—पुथल मची हुई है वह इस पथ भ्रष्ट राजनीति का ही नतीजा है। किसी भी देश की राजनीति उसके संविधान के अनुसार ही चलनी चाहिए जब भी संविधान की व्यवस्थाओं को तोड़ने का काम किसी सत्ता द्वारा किया जाता है तो उसके परिणाम क्या होते हैं? 70 के दशक का आपातकाल इसका एक उदाहरण है। लंबे समय से नेता विपक्ष राहुल गांधी जिस संविधान की किताब को हाथों में लेकर घूम रहे हैं और विपक्षी नेता दावा कर रहे हैं कि हम संविधान को नहीं बदलने देंगे क्या उन्हें इसका पता नहीं है कि इस संविधान का हर वह हिस्सा बदला जा चुका है जो सत्ता को अपने अनुकूल नहीं लग रहा था। बात चाहे निर्वाचन आयोग जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में आयुक्त की नियुक्तियाें की हो या फिर सीबीआई और ईडी में बैठे अधिकारियों को सेवा विस्तार कई बार बढ़ाने की। अथवा विपक्षी दलों के नेताओं को डराने धमकाने तथा उन्हें निराधार आरोपों के दम पर जेलों में ठूसे जाने की। बात सिर्फ यही तक सीमित नहीं है बात अब आम आदमी के उस संवैधानिक अधिकार को छीनने तक जा पहुंची है जो उसका सबसे प्रभावी और महत्वपूर्ण अधिकार है। अब सत्ता द्वारा तय किया जा रहा है कि कौन वोट डालेगा और कौन नहीं? किसकी कहां सरकार बनेगी और किस दल को कितनी सीटें मिलेगी सब कुछ सत्ता में बैठे लोगों को ही तय करना है तब फिर हम देश के लोग और विपक्षी दलों के नेता क्यों और किस संविधान का मुगालता पाले बैठे हैं राहुल गांधी देश की जनता और विपक्ष के नेताओं को लगातार इस सच का आइना दिखा रहे हैं। चीख चीख कर जनता को भी इस बात को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि किस तरह से आपको अपने अधिकारों से बेदखल किया जा रहा है। लेकिन उनकी आवाज अब नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित हो रही है। देश के गरीब और पिछड़े लोगों से लेकर देश की युवा पीढ़ी जिसे जेन—जे कहा जाता है, से भी वह सीधा संवाद कर इस सच को समझाने का प्रयास कर रहे हैं। केंद्रीय सत्ता पर आसीन भाजपा या एनडीए की सरकार लगातार चुनाव दर चुनाव अपनी एक सोची समझी रणनीति के तहत विपक्षी दलों का अस्तित्व समाप्त करने और सत्ता पर कब्जा करने की कोशिशोंं में कामयाब होते जा रहे हैं। खास बात यह है कि जेडीयू और टीडीपी के नेता नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जिसके समर्थन से वर्तमान समय में एनडीए सत्ता में बनी हुई है वह भी यह सोच बैठे हैं कि हमें किसी से क्या लेना देना है। केंद्र से लेकर अपने—अपने राज्यों में अपनी सत्ता का सुख भोग रहे हैं हमारे लिए बस यही काफी है। देश और देश की जनता का क्या होगा यह वह जानकर भी इस सोच के साथ राजनीति कर रहे हैं तो उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह भी इसी देश की जनता का हिस्सा है और आने वाले समय में उनका हाल भी शिवसेना जैसा ही होगा। जहां तक बात आम जनता की है वह भी अगर अपने संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए नेताओं का मुंह ही देखती रहेगी तो आने वाले समय में उसके पास कोई संवैधानिक अधिकार तो रहेगा ही नहीं। इसके साथ ही उसे किसी सरकारी योजना का लाभ भी नहीं मिल पाएगा और न हर बार चुनाव से पूर्व उनके खातों में 10 हजार रूपये की रकम आएगी जैसे इस चुनाव के समय में आई है।




