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नए भारत की नई तस्वीर

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देश की राजनीति में क्या हो रहा है? भले ही एक आम आदमी इस सवाल का जवाब सिर्फ देश के चुनावो में होने वाली हार जीत से आगे कुछ न सोच पा रहा हो या कुछ समझ पा रहा हो, लेकिन बीते एक दशक से देश की राजनीति में जो कुछ हुआ है और हो रहा है राजनीति की समझ रखने वाले इसे 70 के दशक के आपातकाल से भी गंभीर मान रहे हैं। उनका कहना है कि उस समय कम से कम जनता के पास उसके वोट की ताकत तो थी जिसने देश के संविधान और लोकतंत्र को पुर्नस्थापित करने में तनिक भी समय नहीं लगाया था। लेकिन आज के वर्तमान राजनीतिक दौर में तो आम आदमी के वोट का अधिकार और उसकी ताकत को भी हाईजैक कर लिया गया है। खास बात यह है कि अब विपक्ष और जनता भी मिलकर इस राजनीतिक संकट का कोई समाधान नहीं ढूंढ़ पा रही है, समाधान करना तो बहुत दूर की बात है। अभी—अभी बिहार चुनाव के जो नतीजे आए हैं उन्हें लेकर टीवी चैनलों पर बैठे राजनीतिक दलों के नेता और पंडित सभी माथा पच्ची कर रहे हैं तथा उनके पास सिवाय इस बात पर चर्चा करने के अब मुख्यमंत्री कौन बनेगा? राजद और कांग्रेस की करारी हार का क्या कारण है अब तेजस्वी यादव क्या करेंगे और राहुल गांधी कौन सा बम फोड़ेंगे, जैसे सवालों पर बकवास करने के अलावा कोई कुछ भी नहीं है। न्यायपालिका भी लोकतंत्र और संविधान की रक्षा में अब कितना सामर्थ्यवान रह गया है? आज इस सवाल पर लोग चिंतन करने पर विवश हैं। भले ही मुख्य न्यायाधीश ने बीते दिनों कहां हो कि बिहार के चुनाव में अगर कोई गड़बड़ी हुई तो वह चुनाव को रद्द भी कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या वह ऐसा कर पाएंगे? एक नहीं इस बिहार चुनाव को लेकर अनगिनत सवाल हैं जिनका जवाब न निर्वाचन आयोग दे पा रहा है और न चुनाव की जीत का जश्न मनाने वाली राजनीतिक पार्टियां। सवाल यही से शुरू होता है और सवाल का जवाब भी यही से मिलता है। निर्वाचन आयोग मतदान से पूर्व कुल मतदाताओं की जो संख्या बताता है चुनाव के बाद जब कुल मतदान का आंकड़ा बताया जाता है तो वह कुल मतदाताओं की संख्या से भी कई लाख अधिक होता है। चुनाव के दौरान भी जब राज्य मेंं चुनाव आचार संहिता लागू होती है उस समय भी कैसे सरकारी योजनाओं का लाभ देने के नाम पर महिलाओं के खातों में 10000 कैश ट्रांसफर होता है और बेरोजगार युवाओं को पैसा दिए जाने का काम किया जाता है क्या यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है। कुल मिलाकर जब देश की सरकार द्वारा सभी संवैधानिक संस्थाओं को हाईजैक कर लिया गया है तो प्रशासन सत्ता के इशारे पर चलने को मजबूर है और जब मीडिया सत्ता की चापलूसी को अपनी पत्रकारिता का धर्म मान ले तथा न्यायपालिका सत्ता के खिलाफ फैसला न कर पाए ऐसी स्थिति में अगर आप लोकतंत्र और संविधान का ढोल पीट रहे हैं तो पीटते रहिए आपको अब बस इस ढोल को पीटने की स्वतंत्रता बची है क्योंकि सवाल पूछने पर आपको जेल में डाल दिया जाएगा। रही बात देश के संविधान और लोकतंत्र की तो बस थोड़ा सा और इंतजार कीजिए आपके पास यह भी बचने वाला नहीं है। क्योंकि यह नए भारत के नए निर्माण का समय है जो सत्ता में बैठे लोगों द्वारा किया जा रहा है।

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