बिहार विधानसभा के वह चुनावी नतीजे आ चुके हैं जिनका इंतजार सिर्फ बिहार के नेता और आम आदमी को ही नहीं था बल्कि पूरे देश की निगाहें उस पर लगी हुई थी। मतदान के बाद आए एग्जिट पोल में जिस तरह से एनडीए
गठबंधन को जीतते हुए दिखाया गया और लोग इस पर हैरानी जता रहे थे उससे अधिक हैरान करने वाले वास्तविक चुनावी नतीजों ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में एनडीए गठबंधन ने 200 से भी अधिक सीटें जीतकर बिहार में एक ऐसा राजनीतिक इतिहास रच दिया है जिसकी कोई भी राजनीतिक पंडित सपने में भी कल्पना नहीं कर सकता था। वह तमाम लोग भी जो एनडीए के जीतने का दावा कर रहे थे उन्हें भी इस नतीजे पर कम हैरानी नहीं है। वैसे भी बीते एक दशक से देश की राजनीति में जो कुछ भी घटित हो रहा है उसमें अब किसी को भी किसी बात पर हैरान होने की जरूरत नहीं रह गई है क्योंकि अब इस देश में मोदी है तो मुमकिन है, ही सबसे बड़ा सत्य बनकर सामने खड़ा है। लालू यादव की राजद और कभी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी रही कांग्रेस ने इस चुनाव में भाजपा और एनडीए को हराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी लेकिन उनके हिस्से में अब सिर्फ एक ऐसी हताशा ही आई है कि विपक्ष जिसे गिनती की सीटें ही मिली है इस चुनाव और सरकार का विरोध करने के लिए विधानसभा सदस्य की शपथ तक न लेने का मन बना रहे हैं। उनका साफ कहना है कि अब विधानसभा में उनकी जरूरत भी क्या है? सब कुछ जब आप ही हैं तो आप ही संभालिए। देश के इतिहास में शायद ऐसी स्थिति इससे पूर्व कभी देखने को नहीं मिली है। जैसा इस बार बिहार में देखा जा रहा है। जब 20 साल से चले आ रहे नीतीश के सुशासन को बरकरार रखने के लिए सत्ता के विपक्ष में ऐसी सुनामी आई कि बिहार ही नहीं पूरे देश की राजनीति को जिसने झकझोर कर रख दिया है। अब तो चारों ओर से बस एक ही आवाज आ रही है कि भाजपा व मोदी के रहते उन्हें कोई चुनाव हरा ही नहीं सकता है। खास बात यह है कि जनता ने जो भी जनादेश दिया हो इस नितीश बाबू को भी भाजपा ने ठिकाने लगा दिया है क्योंकि भाजपा सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनकर इस चुनाव में उभरी है। पहली बार भाजपा का बिहार में अपना सीएम बनाने का सपना पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता है अगर नीतीश भी भाजपा के साथ न रहे तब भी वह अकेले अपने दम पर बिहार में न सिर्फ सरकार बना सकती है बल्कि सरकार पूरे 5 साल तक चला भी सकती है। अब नितीश बाबू क्या करेंगे? यह तो आने वाला समय ही बताया। लेकिन बिहार के इस चुनाव के परिणामों के बाद इस देश का लोकतंत्र और निर्वाचन आयोग ही नहीं बल्कि देश का संविधान भी एक बार ऐसे अनुत्तरित सवालों की घेरे में आ चुका है कि जिनका जवाब अभी नहीं तलाशा तो कभी नहीं मिल सकेगा।




