नए भारत की यह नई तस्वीर सचमुच बहुत ही डराने वाली है। जिस सोशल मीडिया और डिजिटल इंडिया ने भाजपा और नरेंद्र मोदी को देश की सर्वाेच्च कुर्सी पर लाकर बैठाया था अब वही उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका है। देश के चीफ जस्टिस के साथ दो दिन पूर्व भरी अदालत में जूता फेंकने की घटना को लेकर जब पूरे देश में निंदा हो रही थी उस समय देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से लेकर सभी नेता चुप्पी साधे हुए थे। अगर ट्रोलर टीम ने इस पूरी घटना को सनातन से जोड़कर मर्यादाओं की सीमा तोड़ते हुए ऐसे जजों को सड़कों पर पीटना चाहिए या उनके मुंह पर थूका तो जा सकता है, अधिकतम क्या होगा 6 माह की सजा ही तो होनी है जैसी बेहूदा बातें नहीं की गई होती तो शायद सत्ता का मौन भी बना रहता। लेकिन ट्रोलर आर्मी ने ऐसी सीमाएं तोड़ी की पीएम मोदी को इसकी निंदा भी करनी पड़ी और चीफ जस्टिस को फोन भी करना पड़ा। पीएम मोदी को इस बात का भी शायद अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनका यह कदम उनके समर्थकों को इतना नागवार गुजरेगा कि वह मोदी को बदलने की मांग कर डालेंगे या यह कहने लगेंगे कि मोदी से तो राहुल ही अच्छा है। इस घटना के पीछे का रहस्य शायद यह ट्रोलर आर्मी और व मोदी मीडिया भी नहीं जानता है कि मामला सिर्फ इस घटना तक सीमित नहीं है अपितु सत्ता की जड़ों से जुड़ा है। बहुत जल्द ही सुप्रीम कोर्ट को बिहार में चुनाव आयोग द्वारा कराई गई एसआईआर जैसे मुद्दों पर अपना फैसला सुनाना है जिस पर सुनवाई चल रही है तथा सुप्रीम कोर्ट कल निर्वाचन आयोग को महज कुछ ही घंटो का समय देते हुए कहा गया है कि उसे नए वोटरों जिनके नाम मतदाता सूची में जोड़े गए हैं तथा जिनके नाम काटे गए हैं उनकी जानकारी दी जाएगी वह कौन लोग है इसकी जानकारी कोर्ट को भी देनी होगी तथा सार्वजनिक करनी होगी और अगर उसमें कोई गड़बड़ी होती है तो वह पूरी प्रक्रिया को रद्द भी कर सकते हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिस पर भाजपा का पूरा खेल निर्भर करता है जिसके दम पर भाजपा के नेता भरी सभा में रहते हैं कि हमें तुम्हारा वोट नहीं चाहिए या फिर तुम वोट किसी को भी दो पर जीतेगी भाजपा ही। बिहार की 7.50 करोड़ की वोटर लिस्ट में अगर डेढ़ करोड़ वोटो की घट—बढ़ से इस मुद्दे पर कोर्ट का कोई ऐसा फैसला आता है जो संविधान सम्मत होता है तो बिहार चुनाव में क्या होने वाला है इसका अंदाजा सभी को है। 2014 के बाद न्यायपालिका में होने वाले जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलने के प्रयासों से लेकर निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलकर तथा देशभर के विश्वविघालयों में उच्च पद पर नियुक्तियां तक सब कुछ तो बदला जा चुका है। संविधान प्रस्तावना से धर्मनिरपेक्ष शब्द को जब हटाया जा चुका है तो फिर नामुमकिन क्या है? देश की संवैधानिक सभी संस्थाओं पर कब्जे के बाद सिर्फ संविधान ही तो बचा है जिसे बचाने के लिए सर्वाेच्च न्यायालय को और चीफ जस्टिस तक को सवालों के घेरे में लाया जा रहा है। क्या इससे पहले सत्ता ने कभी किसी सेवानिवृत्ति जस्टिस को राज्यसभा में भेजा गया क्या किसी प्रधानमंत्री को चीफ जस्टिस के घर पूजा करते देखा था किसी ने। क्या कभी किसी ने सुप्रीम कोर्ट को किसी मंत्री द्वारा सुप्रीम कोठा कहते सुना था या उस पर देश में गृह युद्ध कराने के आरोप लगाते देखा था? अब तो हद हो गई कि जूता फेंकने की नौबत तक आ गई यह नए भारत की नई तस्वीर है कि पीएम चीफ जस्टिस को फोन कर रहे हैं। शायद देश में पहले ऐसा कभी नहीं देखा गया। यह वास्तव में चिंताजनक ही है। आने वाले समय में क्या—क्या हो सकता है? इसकी कोई कल्पना नहीं की जा सकती है?




