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एक बेदम संबोधन

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भले ही देश के कुछ मीडिया प्रतिष्ठानों और टीवी चैनलों द्वारा यह प्रचारित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी गई हो कि पीएम मोदी लाल किले के प्राचीर से 12वीं बार देश को संबोधित करेंगे लेकिन इस 12वीं बार पर मीडिया ने जितना जोर दिया था उसे 12वीं बार के पीएम मोदी के भाषण का जो विश्लेषण किया जा रहा है उससे उन्हें अत्यधिक निराशा हो रही होगी। पीएम मोदी के पिछले 11 स्वतंत्रता दिवस के तमाम संबोधनों की तुलना की जाए तो उनका यह संबोधन अत्यंत ही बेदम कहा जा रहा है। विश्लेषक इसे एक निराशा हताशा और डरे हुए नेता का संबोधन तक बता रहे हैं। तथा कुछ लोगों को यह संबोधन देश के लिए संबोधन था ही नहीं यह तो आरएसएस, भाजपा और उसे सेना के लिए था जिसको भरोसे में रखकर वह सत्ता में बने रहना चाहते हैं। अपने संबोधन में किए गए पाकिस्तान के जिक्र के बारे में लोगों का यही कहना है कि अब वह चीन, अमेरिका और रूस का नाम इसलिए नहीं ले सके क्योंकि उन्हें पता चल चुका है कि विदेशों में उनके नाम का डंका कितना बज रहा है। अपने भाषण में अब वह आरएसएस के एजेंडे पर नतमस्तक दिखाई दिए उनको अब आरएसएस की तारीफ करना एक मजबूरी बन चुका है। उनके द्वारा संघ को 100 साल पूराना सांस्कृतिक संगठन या एनजीओ क्यों बताना पड़ रहा है तथा स्वदेशी का जागरण क्यों करना पड़ रहा है क्यों महात्मा गांधी के साथ वीर सावरकर की फोटो छापनी पड़ी है इस पर 100 सवाल उठाये जा रहे हैं। लोगों का मानना है कि डेमोग्राफिक चेंज ओर घुसपैठियों की बात वह सिर्फ अपने सत्ता में बने रहने के लिए ही कर रहे हैं, हिंदुत्व के एजेंडे के जरिए वह अब आरएसएस की बात करके सत्ता में बने रहने के लिए गिड़गिड़ाते दिख रहे है। जबकि अभी चंद दिन पूर्व ही जेपी नड्डा ने कहा था कि अब उन्हें आरएसएस की कोई जरूरत नहीं रह गई है। प्रधानमंत्री मोदी को अब इस बात का एहसास हो चुका है कि ऑपरेशन सिंदूर और अब वोट चोरी के मुद्दे और एस आई आर पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों के बाद उनकी राजनीतिक जमीन पैरों के नीचे से खिसक गई है। नेता विपक्ष राहुल गांधी को अपने संबोधन के दौरान पांचवी लाइन में बैठा कर सुर्खियां बटोरने वाले प्रधानमंत्री इस संबोधन में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को तलाशते रह गए। उन्होंने इस बार न तो गांधी परिवार पर कोई हमला बोला न ही ममता बनर्जी पर। वह अब शायद विपक्ष से भी सहयोग की उम्मीद तलाश रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि संसद से लेकर सड़कों तक विपक्ष इतना हमलावर हो चुका है कि अब आगे इस प्रतिद्वंव्न्दिता को वह नहीं बढ़ाना चाहते। एसआईआर को लेकर जो हंगामा जारी है वह बिहार की हार की तरफ उन्हें धकेलता जा चुका है और नायडू और नीतीश जैसे सभी सहयोगी उनसे हाथ झटकने को तैयार बैठे हैं। कल जब पीएम मोदी लाल किले से बोल रहे थे उस समय राहुल गांधी कांग्रेस भवन में ध्वजारोहण के समय तेज बारिश में भीगते हुए राष्ट्रीय गान कर रहे थे। उनकी इस तस्वीर पर वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने एक्स पर लिखी पोस्ट में कहां है कि 140 करोड़ के मुल्क में सिर्फ एक आदमी का सहारा इतना फर्क पैदा कर देगा यह कभी सोचा न था। निश्चित तौर पर उनकी यह टिप्पणी यह बताने के लिए काफी है कि अब मोदी से जनता का भरोसा समाप्त होता जा रहा है और देश के लोग राहुल गांधी को नए भारत की नई उम्मीद के रूप में देख रहे हैं। मोदी को अब इस बात का डर सता रहा है कि सत्ता अगर हाथ से गई तो उनका क्या होगा? 10 साल में उनसे जो गलतियां हुई है उन्हें सुधारने की बातें करना क्या उन्हें और उनकी सत्ता को बचा पाएगी यह अहम सवाल है।

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