देश के लोगों ने अब तक नेताओं द्वारा नोट की चोरी किए जाने के तमाम मामले सुने और देखे थे। बोफोर्स घोटाले से लेकर चंदा घोटाले तक जिनकी गूंज संसद से लेकर देश के सर्वाेच्च न्यायालय तक सुनाई दी। अभी बीते दिनों केंद्र की मोदी सरकार द्वारा चुनावी चंदे के लिए लाये गए चुनावी बाण्ड को सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक ठहराया गया था लेकिन अब वोट की चोरी के जिस मामले का खुलासा नेता विपक्ष द्वारा एक पत्रकार वार्ता में ससबूत के साथ पेश किया गया है उस खुलासे से पूरे देश की राजनीति से लेकर पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। क्योंकि यह मामला इतना संजीदा है कि वह संविधान द्वारा आम आदमी को मिले वोट के उस अधिकार से जुड़ा हुआ है जिसके दम पर देश का आम आदमी आसानी से यह कह देता है कि अगर सरकार ठीक से काम नहीं करेगी तो हम सरकार बदल देंगे। और अगर कोई सरकार या संस्था आम आदमी से उसके वोट की ताकत छीन ले तो आम आदमी के पास बचता ही क्या है? और ऐसी स्थिति में संविधान और लोकतंत्र के मायने भी क्या कुछ रह जाते हैं। आप वोट किसी को दें लेकिन सरकार उसी की बनेगी जो सत्ता में बैठे लोग चाहेगे या फिर सत्ता और चुनाव आयोग में बैठे लोग चाहेंगे। बीते कुछ सालों से देश भर में कुछ भाजपा नेताओं के बयान भी आपने जरूर सुने होंगे कि आप कुछ भी कर लो सरकार तो भाजपा की ही बनेगी। यानी कि भाजपा ने देश भर में वोट चोरी का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर लिया है कि कोई उसे न चुनाव में हरा सकता है और न सत्ता से बाहर कर सकता है। अगर यह सच है तो यह इस देश के लोकतंत्र और संविधान के लिए सबसे बड़ा खतरा तो है ही बल्कि आम आदमी के लिए भी सबसे अधिक चिंतनीय सवाल है। राहुल गांधी ने कर्नाटक के एकमात्र विधानसभा क्षेत्र से जहां 6 लाख के आसपास कुल मतदाता है , चुनाव आयोग द्वारा उपलब्ध सूची में से एक लाख से अधिक फर्जी वोटो का खुलासा जिस तरह सबूत के साथ पेश किया है उस पर न तो अब चुनाव आयोग को कोई जवाब देते बन रहा है न सरकार को। तथा यह मामला इतना तूल पकड़ चुका है कि इसके सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने और इस पर राष्ट्रियव्यापी आंदोलन छेड़ने जा रहे समूचे विपक्ष का लामबंद होना तय माना जा रहा है। भले ही इस मुद्दे को लेकर अब कितना भी लंबा आंदोलन चले लेकिन अब यह लकीर खिंच चुकी है कि दूध का दूध और पानी का पानी होकर ही रहेगा। बीते 5—7 सालों में इस देश में राजनीति में बहुत कुछ ऐसा हुआ है जो पहले कभी नहीं हुआ था। विधानसभा जैसे चुनाव में गुजरात से लेकर मध्य प्रदेश तक निर्विरोध भाजपा प्रत्याशियों का चुनाव लड़े बिना ही विजयी घोषित किया जाना इसका एक उदाहरण है। लेकिन वोटो की चोरी से किसी राजनीतिक दल द्वारा सत्ता पर कब्जा कर लिए जाने और मोदी के प्रधानमंत्री बनने की घटना जैसा कि राहुल गांधी द्वारा आरोप लगाया जा रहा है तथा निर्वाचन आयोग को यह चुनौती दी जा रही है कि वह चोरी के वोट से प्रधानमंत्री बने हैं सिद्ध कर देंगे अगर उन्हें डिजिटल डाटा उपलब्ध करा दिया जाए। यह कोई छोटा—मोटा आरोप नहीं है। राहुल का कहना है कि वह महज 25 सीट अधिक जीतने से प्रधानमंत्री बने हैं लेकिन यह सीटें चोरी से जीती गई है। संविधान लोकतंत्र और वोट के अधिकार की यह जंग देश की राजनीति में अब क्या गुल खिलाएगी यह आने वाला समय ही तय करेगा।




