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बदइंतजामी का कहर

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उत्तराखंड में आसमान खुलकर बरस रहा है और पहाड़ लगातार दरक रहे हैं। कहीं सड़क नदी में समा रही है, कहीं मलबा घरों की चौखट तक पहुंच गया है, कहीं पुलों पर खतरा मंडरा रहा है तो कहीं स्कूल और अस्पताल तक असुरक्षित हो गए हैं। चारधाम यात्रा मार्ग से लेकर गांवों की संपर्क सड़कों तक बारिश ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। हर साल मानसून आता है, बादल बरसते हैं और सरकारें आपदा प्रबंधन के दावे करती हैं। लेकिन सवाल वही है। आखिर हर मानसून में उत्तराखंड इतना बेबस क्यों दिखाई देता है? बारिश प्राकृतिक है, लेकिन बारिश से होने वाली हर तबाही प्राकृतिक नहीं होती। पहाड़ की भौगोलिक संवेदनशीलता किसी से छिपी नहीं है। हिमालय युवा पर्वत है, यहां भूस्खलन और भू-धंसाव का खतरा हमेशा रहेगा। लेकिन जब पहाड़ की क्षमता से अधिक सड़कें काटी जाएं, ढलानों को बिना वैज्ञानिक अध्ययन के छेड़ा जाए, नदियों के किनारों पर निर्माण हो, मलबा सीधे नदी-नालों में डाला जाए और जल निकासी की व्यवस्था कागजों में सीमित रह जाए, तो फिर आपदा को केवल प्रकृति का प्रकोप कहकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। सबसे बड़ा संकट यह है कि उत्तराखंड ने आपदा से सीखने की बजाय आपदा के बाद राहत देने की आदत विकसित कर ली है। सड़क टूटी तो जेसीबी पहुंची, पुल बहा तो वैकल्पिक मार्ग की घोषणा हुई, गांव कट गया तो राशन पहुंचा और भवन क्षतिग्रस्त हुआ तो मुआवजे की बात शुरू हो गई। लेकिन यह व्यवस्था उस सवाल का जवाब नहीं देती कि वही सड़क अगले साल फिर क्यों टूटेगी? वही पहाड़ फिर क्यों दरकेगा? वही नदी फिर क्यों बस्तियों के लिए खतरा बनेगी? हर बार मौत के बाद मुआवजा देना सरकार की मजबूरी हो सकती है, लेकिन मौत रोकना सरकार की जिम्मेदारी है। उत्तराखंड के विकास माडल पर भी अब गंभीर बहस जरूरी है। विकास का अर्थ केवल चौड़ी सड़क, बड़ी सुरंग, ऊंची इमारत और नए निर्माण नहीं हो सकता। पहाड़ की प्रकृति को समझे बिना किया गया विकास अंततः विनाश का रास्ता खोल सकता है। सड़क चाहिए, लेकिन ऐसी सड़क चाहिए जो पहाड़ को काटकर नहीं, पहाड़ की प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर बने। सुरंग चाहिए, लेकिन भूगर्भीय अध्ययन और सुरक्षा मानकों के साथ। पर्यटन चाहिए, लेकिन वह स्थानीय पर्यावरण और संसाधनों की क्षमता के अनुरूप हो। विडंबना यह है कि उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन पर चर्चाएं अक्सर तब तेज होती हैं जब कोई बड़ी घटना हो जाती है। कुछ दिन तक बैठकें होती हैं, अधिकारियों को निर्देश दिए जाते हैं, हेल्पलाइन जारी होती है और फिर मौसम साफ होते ही सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। जबकि पहाड़ को केवल मानसून के दिनों में नहीं, पूरे साल बचाने की जरूरत है। सरकार को अब रेस्क्यू से आगे बढ़कर रिस्क प्रिवेंशन की नीति अपनानी होगी। संवेदनशील गांवों की वैज्ञानिक मैपिंग हो। भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की पहचान हो। पुराने पुलों और सड़कों का स्ट्रक्चरल ऑडिट हो। स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी भवनों की सुरक्षा जांच हो। नदी-नालों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण पर कठोर कार्रवाई हो। निर्माण की अनुमति केवल कागजी नक्शों के आधार पर नहीं, बल्कि भूगर्भीय और पर्यावरणीय जोखिम के आकलन के आधार पर दी जाए और सबसे जरूरी है आपदा के नाम पर खर्च होने वाले पैसे का सामाजिक आडिट हो। उत्तराखंड की जनता को हर साल एक ही तस्वीर देखने को मिलती है। बारिश शुरू, सड़क बंद, बारिश तेज, गांव अलग-थलग, नदी बढ़ी, प्रशासन अलर्ट, सड़क टूटी, मरम्मत का आदेश। आखिर यह चक्र कब टूटेगा? यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, पूरे राजनीतिक तंत्र से है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, पहाड़ की पीड़ा किसी पार्टी की नहीं होती। आपदा के समय आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है साझा रणनीति। विपक्ष को भी केवल बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय सरकार से ठोस जवाब मांगना होगा कि कितने संवेदनशील क्षेत्र चिन्हित हुए, कितने सुरक्षित किए गए और पिछले वर्षों की आपदाओं से क्या सीखा गया? उत्तराखंड को राहत की राजनीति नहीं, सुरक्षा की राजनीति चाहिए। यह समय भीड़ बढ़ाने वाले पर्यटन माडल पर पुनर्विचार का है। यह समय पहाड़ की वहन क्षमता तय करने का है। यह समय नदियों को केवल बिजली उत्पादन और निर्माण की जमीन मानने की मानसिकता बदलने का है। यह समय यह स्वीकार करने का है कि हिमालय कोई खाली जमीन नहीं, बल्कि एक जीवित और अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है। आज अगर पहाड़ की चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया तो आने वाले वर्षों में बारिश का हर मौसम और भयावह हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज बदल रहा है। कम समय में अत्यधिक बारिश, अचानक बाढ़ और असामान्य मौसम की घटनाएं नीति-निर्माताओं के सामने नई चुनौती हैं। ऐसे में पुराने अनुभवों और पुराने ढर्रे से उत्तराखंड की सुरक्षा नहीं हो सकती। उत्तराखंड को सिर्फ आपदा से बचाना नहीं है, उसे ऐसी विकास नीति देनी है जिसमें आपदा का खतरा ही कम हो। बारिश पहाड़ की दुश्मन नहीं है। बारिश तो इसी हिमालय की जीवनधारा है। असली खतरा तब पैदा होता है जब इंसान प्रकृति की सीमा भूल जाता है। इसलिए इस मानसून की सबसे बड़ी सीख यही होनी चाहिएकृपहाड़ को जीतने की कोशिश बंद कीजिए, पहाड़ के साथ जीना सीखिए। क्योंकि अगर हमने अब भी नहीं सीखा, तो अगली बारिश सिर्फ पानी लेकर नहीं आएगी। वह हमारी विकास नीतियों का हिसाब भी मांग सकती है।

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