Home उत्तराखंड देहरादून अब महामारी का खतरा

अब महामारी का खतरा

0
31

नेपाल की नदियां इन दिनों सिर्फ पानी नहीं बहा रहीं, वह एक ऐसी त्रासदी की गवाही दे रही हैं जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है। पहाड़ टूटे, बस्तियां उजड़ीं, सड़कें बह गईं और सैकड़ों परिवार अपने लोगों की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। बाढ़ का पानी उतरने के साथ तबाही का दूसरा चेहरा सामने आ रहा है, नदियों के किनारे और मलबे में पड़े शव, भरते हुए शवगृह और अपनों की पहचान के लिए भटकते परिवार। यह महज प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है। अब यह मानवीय और स्वास्थ्य आपदा में बदलने का खतरा पैदा कर रही है। नेपाल में विनाशकारी बाढ़ के बाद सैकड़ों शव बरामद किए जा चुके हैं और हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। कई इलाकों में शवों की पहचान तक मुश्किल हो रही है। शवगृहों पर दबाव बढ़ रहा है और कुछ स्थानों पर अस्थायी दफन की व्यवस्था तक करनी पड़ रही है। ऐसे समय में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राहत अभियान केवल जीवित बचे लोगों की तलाश और मलबा हटाने तक सीमित रहेगा? या सरकारें उस स्वास्थ्य संकट की तैयारी भी करेंगी जो आपदा के बाद तेजी से सामने आ सकता है? बाढ़ के बाद दूषित पानी, खराब स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं के बाधित होने से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। हजारों विस्थापित लोगों के सामने रहने, भोजन और साफ पानी की समस्या है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार बड़ी संख्या में प्रभावित लोगों को पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी तत्काल सहायता की जरूरत है। यही वह मोड़ है जहां प्रशासनिक संवेदनशीलता और वैज्ञानिक तैयारी दोनों की परीक्षा होती है। शव किसी आंकड़े का हिस्सा नहीं होते। हर शव के पीछे एक परिवार होता है, एक कहानी होती है और किसी के लौट आने की उम्मीद होती है। इसलिए शवों का सम्मानजनक प्रबंधन, पहचान और अंतिम संस्कार केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, मानवीय जिम्मेदारी है। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राहत शिविरों और प्रभावित बस्तियों में स्वच्छ पानी, साफ-सफाई और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं तत्काल पहुंचें। नेपाल की इस त्रासदी ने हिमालय की नाजुकता को एक बार फिर सामने ला दिया है। जिस हिमालय को लंबे समय से विकास की प्रयोगशाला बनाने की होड़ लगी है, वही हिमालय अब बार-बार चेतावनी दे रहा है। ग्लेशियरों की अस्थिरता, अचानक आने वाली बाढ़, अनियंत्रित निर्माण और जलवायु परिवर्तन के बदलते प्रभावों को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखने की भूल अब भारी पड़ सकती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि आपदा समाप्त होने के बाद भी उसका खतरा समाप्त नहीं होता। पानी उतर जाता है, लेकिन बीमारी, विस्थापन, बेरोजगारी, मानसिक आघात और भूख का संकट लंबे समय तक बना रह सकता है। नेपाल में हजारों परिवारों के लिए आने वाले दिन इसी कठिन परीक्षा के होंगे। इस त्रासदी से भारत को भी सीखना होगा। हिमालय राजनीतिक सीमाओं से बंटा हो सकता है, लेकिन उसकी नदियां और पारिस्थितिकी सीमाओं को नहीं मानतीं। नेपाल में जो हुआ, उसका असर नीचे की ओर बसे भारतीय क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। इसलिए भारत और नेपाल के बीच केवल आपदा के समय राहत सहयोग नहीं, बल्कि साझा हिमालयी आपदा प्रबंधन तंत्र की जरूरत है। आज जरूरत संवेदना के साथ विज्ञान की है। राहत के साथ दीर्घकालीन पुनर्वास की है। शवों की तलाश के साथ जीवित बचे लोगों के भविष्य की चिंता की है। नेपाल को इस समय सिर्फ आर्थिक मदद नहीं चाहिए, उसे समन्वित मानवीय सहायता, स्वास्थ्य व्यवस्था, स्वच्छ पेयजल, संचार और वैज्ञानिक आपदा प्रबंधन की जरूरत है और दुनिया को यह समझना होगा कि हिमालय की चेतावनी को अनसुना करने की कीमत केवल नेपाल नहीं चुका रहा। यह पूरी हिमालयी पट्टी के लिए चेतावनी है। नदियों में बहती लाशें सिर्फ एक देश की त्रासदी नहीं हैं। वह उस विकास माडल पर सवाल हैं, जो प्रकृति की सहनशीलता को अंतहीन मान बैठा है। आज नेपाल रो रहा है और कल यह सवाल हमारे दरवाजे पर भी खड़ा हो सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here