राजनीति में प्रतीक कभी-कभी इतने ताकतवर हो जाते हैं कि वह भाषणों से ज्यादा असर करने लगते हैं। कभी प्याज राजनीति का प्रतीक बनता है, कभी टमाटर, कभी बेरोजगार युवाओं की फाइलें और कभी सड़क पर चलता हुआ काकरोच। अब अगर काकरोच दोबारा सड़कों पर उतरने की बात हो रही है तो इसे केवल मजाक समझकर खारिज करना आसान है, लेकिन इसके पीछे छिपे राजनीतिक संकेतों को समझना जरूरी है। काकरोच आखिर आया कहां से? वह किसी पार्टी का चुनाव चिह्न नहीं, किसी विचारधारा का झंडा नहीं और न ही वह किसी राजनीतिक दल का सदस्य है। लेकिन जब जनता को लगने लगे कि उसकी शिकायतें सुनने वाला कोई नहीं है, जब बेरोजगारी पर बहस की जगह बयानबाजी होने लगे, जब पेपर लीक के सवाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में खो जाएं और जब महंगाई, रोजगार, शिक्षा तथा सड़क जैसे मुद्दों पर सरकार और विपक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने में व्यस्त रहें, तब व्यंग्य भी राजनीति का हथियार बन जाता है। काकरोच इसी व्यंग्य का प्रतीक है। दिलचस्प यह है कि सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की नौटंकी बता सकता है और विपक्ष इसे जनता के गुस्से की आवाज। दोनों अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से इसकी व्याख्या करेंगे। मगर असली सवाल यह है कि आखिर जनता को ऐसी भाषा और ऐसे प्रतीकों की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या लोकतंत्र में जनता की सामान्य शिकायतें इतनी कमजोर हो गई हैं कि उन्हें सुनाने के लिए सड़क पर कोई नया तमाशा खड़ा करना पड़े? उत्तराखंड की राजनीति में यह सवाल और गंभीर है। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में जुटी है। कांग्रेस सरकार को घेरने के मुद्दे तलाश रही है। क्षेत्रीय दल अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश में हैं। हर पार्टी के पास रणनीति है, नारा है, पोस्टर है और सोशल मीडिया की टीम है। लेकिन जनता के पास क्या है? उसके पास बेरोजगारी का अनुभव है, महंगी होती रोजमर्रा की जिंदगी है, भर्ती परीक्षाओं को लेकर असंतोष है, पहाड़ की सड़कों की चिंता है और पलायन का पुराना सवाल है। यही वह जगह है जहां कॉकरोच जैसे प्रतीक राजनीति के लिए आईना बन जाते हैं। सत्ता को यह समझना होगा कि किसी प्रदर्शन का मजाक उड़ाने से उसके पीछे छिपी बेचौनी खत्म नहीं होती। यदि युवा सड़क पर उतरता है तो उसे केवल राजनीतिक साजिश बताना समस्या का समाधान नहीं। यदि छात्र सवाल पूछता है तो उसे विपक्ष का कार्यकर्ता बताना आसान रास्ता है, लेकिन लोकतांत्रिक रास्ता नहीं। और यदि कोई समूह व्यंग्य के जरिए अपना विरोध दर्ज करता है तो उससे असहमति हो सकती है, मगर उसके मूल सवालों का जवाब देना जरूरी है। विपक्ष के लिए भी कॉकरोच कोई जादुई चुनावी अस्त्र नहीं है। जनता केवल तमाशे से वोट नहीं देती। कुछ दिनों के लिए सोशल मीडिया पर चर्चा जरूर हो सकती है, वीडियो वायरल हो सकता है और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को उत्साह मिल सकता है, लेकिन चुनाव अंततः रसोई, रोजगार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय समस्याओं पर लौटता है। इसलिए यदि विपक्ष कॉकरोच को जनता के गुस्से का प्रतीक बनाता है तो उसे उस गुस्से के वास्तविक मुद्दों को भी सामने रखना होगा। वरना काकरोच सड़क पर घूमता रहेगा और राजनीति अपने पुराने रास्ते पर। सबसे बड़ा खतरा यही है कि लोकतंत्र में मुद्दों की जगह प्रतीक ले लें। बेरोजगारी की जगह नारा, भर्ती की जगह आरोप, सड़क की जगह फोटो, महंगाई की जगह बयान और युवाओं के भविष्य की जगह सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग पोस्ट। यह लोकतंत्र की कमजोरी होगी। काकरोच दोबारा सड़कों पर उतरें या न उतरें, असली सवाल यह है कि जनता कब तक अपने सवाल लेकर सड़कों पर उतरती रहेगी? अगर किसी युवा को नौकरी के लिए आंदोलन करना पड़े, किसी छात्र को परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठानी पड़े, किसी गांव को सड़क के लिए मानव श्रृंखला बनानी पड़े और किसी शहर को जलभराव के खिलाफ बच्चों के अनोखे प्रदर्शन का सहारा लेना पड़े, तो सवाल केवल प्रदर्शन करने वालों से नहीं पूछा जाना चाहिए। सवाल व्यवस्था से भी होना चाहिए। 2027 का चुनाव उत्तराखंड के लिए केवल सत्ता बदलने या सत्ता बचाने का चुनाव नहीं होगा। यह इस बात की परीक्षा भी होगा कि राजनीतिक दल जनता के वास्तविक सवालों को कितना समझ पाए हैं। काकरोच चाहे राजनीतिक व्यंग्य का पात्र हो या किसी आंदोलन का प्रतीक, वह एक संदेश जरूर दे रहा है जनता को तमाशा नहीं, जवाब चाहिए और अगर जवाब नहीं मिला तो फिर प्रतीक बदलेंगे, चेहरे बदलेंगे, नारे बदलेंगे और शायद काकरोच भी दोबारा सड़कों पर उतर आएगा। तब उसे भगाने से ज्यादा जरूरी होगा यह पूछना कि आखिर वह सड़क पर आया ही क्यों था।




