Home उत्तराखंड देहरादून परीक्षा सुधार वाली टास्क फोर्स

परीक्षा सुधार वाली टास्क फोर्स

0
33

देश में पिछले कुछ वर्षों में जितनी बार पेपर लीक की घटनाएं सामने आई हैं, उतनी बार युवाओं का विश्वास भी टूटा है। लाखों छात्र वर्षों तक मेहनत करते हैं, परिवार आर्थिक और मानसिक दबाव झेलते हैं, लेकिन परीक्षा से कुछ घंटे पहले या बाद में प्रश्नपत्र लीक होने की खबर पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर देती है। ऐसे माहौल में यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा सुधार के लिए एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स के गठन का निर्णय लिया है, तो यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि देश अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट होने वाला नहीं है। आज समस्या केवल पेपर लीक की नहीं है। समस्या यह है कि परीक्षा प्रणाली के हर स्तर पर पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग चुके हैं। कई राज्यों में भर्ती परीक्षाएं रद्द हुईं, लाखों अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी और कई मामलों में वर्षों तक नियुक्तियां अटकी रहीं। इसका सबसे बड़ा नुकसान युवाओं के भविष्य और देश की उत्पादक क्षमता को हुआ। प्रधानमंत्री की टास्क फोर्स यदि वास्तव में बदलाव लाना चाहती है, तो उसे केवल परीक्षा आयोजित करने की प्रक्रिया नहीं बल्कि पूरे भर्ती और मूल्यांकन तंत्र की समीक्षा करनी होगी। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उसके सुरक्षित वितरण, डिजिटल निगरानी, परीक्षा केंद्रों के चयन, अधिकारियों की जवाबदेही और दोषियों के त्वरित दंड तक हर कड़ी को मजबूत बनाना होगा। सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक इच्छाशक्ति की होगी। अक्सर देखा गया है कि पेपर लीक मामलों में छोटे कर्मचारियों की गिरफ्तारी तो हो जाती है, लेकिन बड़े नेटवर्क तक जांच नहीं पहुंचती। यदि टास्क फोर्स ऐसे संगठित गिरोहों की पहचान कर उन्हें कठोर दंड दिलाने का स्थायी तंत्र विकसित करती है, तभी इसका उद्देश्य पूरा होगा। उत्तराखंड सहित कई राज्यों में भर्ती परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि परीक्षा में गड़बड़ी अब किसी एक राज्य की समस्या नहीं रह गई है। यह राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है। ऐसे में केंद्र सरकार को राज्यों के साथ मिलकर एक समान सुरक्षा मानक तैयार करने होंगे, ताकि किसी भी परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्न न उठे। तकनीक का उपयोग भी समय की मांग है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी, एन्क्रिप्टेड डिजिटल पेपर ट्रांसमिशन, बायोमेट्रिक सत्यापन और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाएं अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी हैं। लेकिन तकनीक तभी सफल होगी जब उसके संचालन में ईमानदारी और जवाबदेही भी सुनिश्चित हो। युवाओं का गुस्सा केवल बेरोजगारी का नहीं है, बल्कि व्यवस्था के प्रति टूटते भरोसे का भी है। जब कोई परीक्षा रद्द होती है तो केवल एक प्रश्नपत्र नहीं फटता, बल्कि लाखों सपनों पर भी चोट लगती है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में परीक्षा सुधार की मांग एक राष्ट्रीय जनभावना का रूप ले चुकी है। सरकार के लिए यह भी जरूरी है कि टास्क फोर्स की सिफारिशें सार्वजनिक हों, उन पर समयबद्ध कार्रवाई हो और उनकी प्रगति की नियमित समीक्षा जनता के सामने रखी जाए। यदि रिपोर्टें केवल फाइलों में बंद रह गईं, तो यह पहल भी पहले की कई समितियों की तरह इतिहास बनकर रह जाएगी। लोकतंत्र में शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि युवा यह मानने लगें कि मेहनत से अधिक प्रभाव और भ्रष्टाचार काम करता है, तो यह किसी भी राष्ट्र के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। अब असली चुनौती इस पहल को परिणामों तक पहुंचाने की है। देश का युवा अब वादे नहीं, व्यवस्था में बदलाव देखना चाहता है। यदि यह टास्क फोर्स परीक्षा प्रणाली को निष्पक्ष, पारदर्शी और सुरक्षित बनाने में सफल होती है, तो यह केवल शिक्षा सुधार नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना होगी। लेकिन यदि यह पहल भी कागजी औपचारिकता बनकर रह गई, तो युवाओं का विश्वास वापस पाना पहले से कहीं अधिक कठिन हो जाएगा। परीक्षा सुधार की यह टास्क फोर्स सरकार के लिए एक प्रशासनिक परियोजना भर नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भरोसे की अग्निपरीक्षा है। अब देश परिणाम चाहता है, केवल आश्वासन नहीं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here