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‘उत्सव’ के बीच पेड़ों पर ‘प्रहार’

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  • विकास की बलिवेदी पर कटते पेड़ों ने खड़ा किया ब्लैक हरेला का सवाल
  • ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर उजड़ती हरियाली पर बढ़ रहा है जन-आक्रोश
  • एक तरफ उत्सव, दूसरी तरफ हजारों पेड़ों की बलि पर युवाओं का विरोध

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड इन दिनों अपने सबसे बड़े लोकपर्व हरेला की तैयारी में जुटा है। सरकार हरियाली का संदेश दे रही है, लाखों पौधे लगाने के दावे किए जा रहे हैं, एक पेड़ माँ के नामष् अभियान की चर्चा हो रही है। लेकिन इसी बीच ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर हजारों हरे-भरे पेड़ों पर आरी चल रही है। विडंबना यह है कि जिस समय पूरे प्रदेश में पेड़ों को जीवन का प्रतीक मानकर हरेला मनाने की तैयारी हो रही है, उसी समय विकास के नाम पर वर्षों पुराने वृक्षों की कतारें धराशायी हो रही हैं। यही विरोधाभास अब सड़क पर उतर आया है। पर्यावरण प्रेमियों, युवाओं और सामाजिक संगठनों ने हरेला पर्व से ठीक पहले ब्लैक हरेला अभियान शुरू कर सरकार और व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है क्या पेड़ काटकर हरियाली का पर्व मनाया जाएगा?
उत्तराखंड की संस्कृति में हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था का पर्व है। इस दिन लोग पौधे लगाते हैं, धरती को प्रणाम करते हैं और हरियाली के संरक्षण का संकल्प लेते हैं। लेकिन ऋषिकेश-देहरादून मार्ग पर तस्वीर बिल्कुल उलट है। सड़क चौड़ीकरण के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है। कई ऐसे पेड़ भी कट रहे हैं, जिन्होंने दशकों तक राहगीरों को छाया दी, पक्षियों को आश्रय दिया और इस क्षेत्र की जैव विविधता को जीवित रखा। युवाओं का कहना है कि यदि विकास का मतलब केवल पेड़ों की बलि है, तो यह विकास नहीं, पर्यावरणीय घाटा है।
काली पट्टी बांधकर विरोध कर रहे युवाओं का संदेश साफ है हरेला केवल पौधे लगाने का सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि पेड़ों को बचाने का सामाजिक संकल्प होना चाहिए। उनका सवाल है कि यदि हजारों परिपक्व पेड़ काट दिए जाएंगे और बदले में कुछ छोटे पौधे लगा दिए जाएंगे, तो क्या दोनों की बराबरी की जा सकती है? एक 40-50 वर्ष पुराने पेड़ की पारिस्थितिक भूमिका को कोई पौधा वर्षों तक पूरा नहीं कर सकता। यह सच है कि सड़कें बननी चाहिए। बेहतर कनेक्टिविटी भी जरूरी है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में आधारभूत ढांचे का विकास विकास यात्रा का अहम हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का मॉडल ऐसा नहीं हो सकता, जिसमें पेड़ों की कटाई न्यूनतम हो? क्या सड़क की डिजाइन, वैकल्पिक संरेखण या वैज्ञानिक योजना से बड़ी संख्या में पेड़ों को बचाया नहीं जा सकता?
पर्यावरणविदों का कहना है कि दुनिया के कई देशों में सड़कें जंगलों के बीच से गुजरती हैं, लेकिन पेड़ों को बचाने के लिए इंजीनियरिंग समाधान अपनाए जाते हैं। उत्तराखंड में यह सोच अभी भी सीमित दिखाई देती है। आज सरकारी समारोहों में पौधरोपण की तस्वीरें खूब दिखाई दे रही हैं। मंत्री, अधिकारी और जनप्रतिनिधि पौधे लगाकर सोशल मीडिया पर हरियाली के संदेश साझा कर रहे हैं, लेकिन जनता यह भी देख रही है कि दूसरी ओर बुलडोजर और मशीनें वर्षों पुराने पेड़ों को गिरा रही हैं। यही विरोधाभास ब्लैक हरेला आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बन गया है। वन विशेषज्ञ लगातार कहते रहे हैं कि पौधरोपण और वन संरक्षण दोनों अलग-अलग बातें हैं। एक ओर हजारों परिपक्व पेड़ काट देना और दूसरी ओर कुछ पौधे लगा देना पर्यावरणीय संतुलन की भरपाई नहीं करता।
सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि सड़क परियोजनाएँ जनहित में हैं और जहाँ पेड़ काटे जा रहे हैं, वहाँ प्रतिपूरक पौधरोपण किया जाएगा। लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि प्रतिपूरक पौधरोपण तभी प्रभावी होगा जब लगाए गए पौधों का वर्षों तक संरक्षण हो और उनकी जीवित रहने की दर सुनिश्चित की जाए। केवल संख्या घोषित कर देने से जंगल वापस नहीं आ जाते। उत्तराखंड के बुजुर्ग कहा करते थे पेड़ काटने से पहले सौ बार सोचो, लगाने के बाद सौ साल तक बचाओ। आज यही संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक है। यदि हरेला केवल सरकारी आयोजन बनकर रह गया और पेड़ों की सुरक्षा पीछे छूट गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी कि हमने हरियाली का पर्व मनाया था या हरियाली का अंतिम संस्कार?

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