Home उत्तराखंड देहरादून पूर्ण साक्षरता का गौरव, अब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौती

पूर्ण साक्षरता का गौरव, अब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौती

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उत्तराखण्ड ने शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसे आने वाले वर्षों में राज्य के विकास की आधारशिला माना जाएगा। नई शिक्षा नीति-2020 तथा उल्लास के तहत देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य बनने का गौरव प्राप्त करना निश्चित रूप से पूरे प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। राज्यपाल की स्वीकृति के साथ उत्तराखण्ड आधिकारिक रूप से पूर्ण साक्षर राज्यों की सूची में शामिल हो गया है। इससे पहले केवल मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम यह उपलब्धि हासिल कर सके थे। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियाँ देश के अधिकांश राज्यों से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हैं। दुर्गम पर्वतीय गांव, पलायन, सीमित संसाधन और बिखरी हुई आबादी के बीच साक्षरता का यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं था। इसमें शिक्षकों, स्वयंसेवकों, शिक्षा विभाग और स्थानीय समुदायों की सामूहिक भूमिका रही है। लेकिन हर उपलब्धि अपने साथ एक बड़ा प्रश्न भी लेकर आती है। क्या केवल पढ़ना-लिखना सीख लेना ही शिक्षा का अंतिम लक्ष्य है? उत्तर स्पष्ट हैकृनहीं। वास्तविक चुनौती अब शुरू होती है। पूर्ण साक्षरता के बाद राज्य को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगारपरक शिक्षा और जीवनोपयोगी कौशल आधारित शिक्षा की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ना होगा। आज उत्तराखण्ड के अनेक सरकारी विद्यालयों में छात्र संख्या लगातार घट रही है। कई विद्यालय शिक्षकविहीन हैं, तो कई विद्यालयों में विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों के विशेषज्ञ शिक्षकों का अभाव बना हुआ है। पहाड़ के अनेक गांवों से पलायन होने के कारण स्कूल खाली हो रहे हैं। दूसरी ओर निजी विद्यालयों की ओर बढ़ता झुकाव सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। नई शिक्षा नीति-2020 का उद्देश्य केवल साक्षर नागरिक तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे युवा तैयार करना है जो रचनात्मक, नवाचारी, तकनीकी रूप से दक्ष और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम हों। यदि विद्यालयों में डिजिटल संसाधन, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएँ और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम विकसित नहीं किए गए, तो पूर्ण साक्षरता का यह गौरव अधूरा रह जाएगा। उत्तराखण्ड जैसे राज्य में शिक्षा को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना भी समय की आवश्यकता है। पर्यटन, जैविक कृकृषि, बागवानी, औषधीय पौधों, आपदा प्रबंधन, पर्वतीय तकनीक और उद्यमिता जैसे विषयों को विद्यालय और उच्च शिक्षा से जोड़ना होगा। तभी शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में राज्य छोड़ने के बजाय उत्तराखण्ड में ही अवसर तलाश सकेंगे। वयस्क साक्षरता अभियान की सफलता का एक बड़ा सामाजिक पक्ष भी है। जब कोई बुजुर्ग पहली बार अपना नाम लिखता है, बैंक का फार्म भरता है, मोबाइल पर संदेश पढ़ता है या सरकारी योजनाओं की जानकारी स्वयं प्राप्त करता है, तब वह केवल साक्षर नहीं बनता, बल्कि आत्मनिर्भर नागरिक भी बनता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह अत्यंत आवश्यक है। हालांकि सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह उपलब्धि केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रह जाए। समय-समय पर स्वतंत्र मूल्यांकन, सामाजिक ऑडिट और वास्तविक सीखने की क्षमता का परीक्षण आवश्यक होगा। केवल आंकड़ों से शिक्षा का स्तर नहीं बढ़ता, उसके लिए निरंतर निगरानी और सुधार की संस्कृति विकसित करनी पड़ती है। उत्तराखण्ड ने आज एक महत्वपूर्ण मंजिल प्राप्त की है, लेकिन शिक्षा की यात्रा मंजिल नहीं, सतत प्रक्रिया है। अब लक्ष्य केवल पूर्ण साक्षर राज्य बने रहना नहीं, बल्कि देश का सर्वश्रेष्ठ शिक्षित, कौशलयुक्त और ज्ञान-आधारित राज्य बनना होना चाहिए। पूर्ण साक्षरता पर प्रदेश को बधाई अवश्य दी जानी चाहिए, परंतु यह उत्सव तभी सार्थक होगा जब हर विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, हर युवा के हाथ में कौशल और हर नागरिक के जीवन में ज्ञान की वास्तविक रोशनी पहुंचे। यही इस ऐतिहासिक उपलब्धि का सबसे बड़ा सम्मान होगा।

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