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शह और मात का ‘एडवांस गेम’

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  • 70 सीटों पर भाजपा ने तैयार की अपनी कोर कमेटियां
  • भगवा बिसात पर चाल चलने को मजबूर होगा विपक्ष
  • मिशन-2027 के लिए कोर कमेटियों का चुनावी चक्रव्यूह
  • बूथ से लेकर टिकट तक की नब्ज टटोलेगा भाजपा संगठन

देहरादून। भाजपा ने चुनावी घंटी बजने का इंतजार नहीं किया, बल्कि हर विधानसभा में अपनी चुनावी चौकी बिठा दी है। अब सवाल यह है कि विपक्ष अभी रणनीति बनाएगा या भाजपा की बिसात पर चाल चलने को मजबूर होगा? उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अभी दूर दिखाई देती है, लेकिन भाजपा ने चुनावी शतरंज की बिसात अभी से बिछा दी है। प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों के लिए अलग-अलग कोर कमेटियों का गठन कर भाजपा ने साफ संकेत दे दिया है कि इस बार चुनाव केवल प्रचार से नहीं, बल्कि सूक्ष्म संगठनात्मक प्रबंधन के दम पर लड़ा जाएगा।
प्रदेश संगठन का यह कदम सामान्य राजनीतिक गतिविधि नहीं माना जा रहा। इसके पीछे बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना, स्थानीय असंतोष की पहचान करना, संभावित प्रत्याशियों की ताकत और कमजोरी का आकलन करना तथा सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना प्रमुख उद्देश्य माना जा रहा है।
भाजपा की नई रणनीति के तहत प्रत्येक विधानसभा सीट पर गठित कोर कमेटी सीधे प्रदेश नेतृत्व को फीडबैक देगी। इसमें क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियां, जातीय एवं सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दे, विकास कार्यों की स्थिति, विपक्ष की सक्रियता और कार्यकर्ताओं की नाराजगी जैसे विषय शामिल रहेंगे। इसका अर्थ साफ है कि पार्टी अब चुनावी निर्णय केवल देहरादून में बैठकर नहीं बल्कि प्रत्येक विधानसभा से मिलने वाले वास्तविक फीडबैक के आधार पर करेगी।
सबसे अधिक फोकस उन सीटों पर किया जा रहा है जहां 2022 के चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इन सीटों पर सांसद, वरिष्ठ नेता और संगठन पदाधिकारियों को विशेष जिम्मेदारी दी गई है ताकि कमजोर बूथों की पहचान कर उन्हें मजबूत किया जा सके। साथ ही उन क्षेत्रों में लगातार जनसंपर्क अभियान चलाने की भी योजना है जहां पार्टी का वोट प्रतिशत कम रहा था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस बार टिकट वितरण से पहले ही संभावित दावेदारों के प्रदर्शन की निगरानी शुरू कर चुकी है। कोर कमेटियां यह भी देखेंगी कि कौन नेता जनता के बीच सक्रिय है, किसकी स्वीकार्यता अधिक है और किसके खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी है। ऐसे में टिकट की दौड़ अब केवल नेताओं की राजनीतिक पहुंच से नहीं बल्कि उनके जमीनी प्रदर्शन से भी तय होती दिखाई दे सकती है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी माहौल को नियंत्रित करना होगी। लगातार दो कार्यकाल सरकार चलाने के बाद स्वाभाविक रूप से जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में कोर कमेटियां केवल चुनावी मशीनरी नहीं बल्कि सरकार और जनता के बीच संवाद का माध्यम भी बनेंगी।
दूसरी ओर कांग्रेस अभी संगठनात्मक पुनर्गठन और नेतृत्व की मजबूती में जुटी दिखाई दे रही है। प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का प्रयास कर रही है, लेकिन भाजपा जिस गति से विधानसभा स्तर तक संगठनात्मक ढांचा मजबूत कर रही है, उससे राजनीतिक मुकाबला और रोचक होने की संभावना है।
राजनीतिक दृदृष्टि से देखा जाए तो भाजपा का यह कदम केवल संगठन विस्तार नहीं बल्कि चुनावी माइक्रो मैनेजमेंट का माडल है। बूथ से लेकर विधानसभा और विधानसभा से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक एक मजबूत फीडबैक सिस्टम तैयार कर पार्टी चुनावी जोखिम को पहले ही कम करना चाहती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा की यह संगठनात्मक तैयारी 2027 में चुनावी बढ़त दिलाती है या कांग्रेस और अन्य दल स्थानीय मुद्दों के सहारे इस रणनीति को चुनौती देने में सफल होते हैं। लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड का चुनावी रण अब समय से पहले ही गर्म होना शुरू हो चुका है।

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