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आस्था की लूट—खसोट का आशय

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आज शायद अपनी बात 6 दशक पूर्व 1971 में आई हिंदी फिल्म हरे रामा हरे कृष्ण के उस गीत से ट्टदेखो ए दीवानो यह काम न करो, राम का नाम बदनाम न करो, से करना ही सबसे उचित होगा। अपने समय के मशहूर गायक किशोर कुमार का यह गीत वर्तमान दौर के हमारे राजनीतिक और सामाजिक हालात पर सटीक साबित हो रहा है। इन दिनों अयोध्या में बने राम मंदिर से करोड़ों रुपए के दान चोरी का मामला सबसे अधिक चर्चाओं में है। राजनीतिक भ्रष्टाचार के अन्य तमाम मामले जैसे मध्य प्रदेश में सीएम मोहन यादव का वह जमीन खरीद का मामला जो इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है यह बताया गया है कि कैसे एक सूबे के सीएम ने अपने उन 37 नाते रिश्तेदारों और परिजनों के नाम पर जमीनों की खरीद फरोख्त की गई है उल्लेख किया गया है तथा उत्तराखंड में भी हरिद्वार में सरकारी जमीन की खरीदने की धाधली हुई। जैसे अनेक मामले चर्चाओं के केंद्र में है। देश की सत्ता में बैठे लोगों द्वारा देश भर में जिस तरह से देश के संसाधनों और खजाने की लूट—खसोट की जा रही है और राम के नाम तथा धार्मिक स्थलों को सुनियोजित ढंग से अपने कब्जे में लिया जा रहा है इसका सच वास्तव में हैरान करने वाला है। हिंदी के महान कवि गजानन मुक्ति बोध की एक कविता अंधेरे में जो लिखा गया है उसमें रात निकलने वाले एक जुलूस में शामिल लोगों द्वारा अपने—अपने क्षेत्र के छठैत (गुंडे—बदमाशों) की मौजूदगी का वर्णन किया गया है। ठीक वैसा ही परिदृश्य आज अपने देश में दिखाई दे रहा है। जिस आस्था के केंद्र राम मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा ने राजनीति की सीढ़ियां चढ़ी थी इस राम मंदिर के ट्रस्टियों द्वारा दान के खजाने को लूटने का जो काम किया गया है तथा अब एसआईटी गठन के जरिए उस पर लीपा पोती की जा रही है वह वास्तव में बेशर्मी की इंतहा ही है। इस मामले की रिपोर्ट एसआईटी द्वारा संजय प्रसाद को सौंपी गई है वह संघी तो है ही साथ ही वह खुद भी राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्यों में शामिल है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस जांच का क्या नतीजा निकल सकता है। यह लूटपाट की कहानी किसी एक धार्मिक स्थल या आस्था केंद्र की नहीं है उत्तराखंड में अभी विगत दिनों मुंबई के एक बड़े व्यवसायी द्वारा केदारनाथ मंदिर को बहुत सोना दान किए जाने और गर्भ ग्रह को स्वर्ण जनित बनाने के लिए सोना दिया गया था जिसमें सोना चोरी होने और गर्भ ग्रह में सोने की जगह मिश्रित धातु की सोने के पानी वाली परत चढ़ाई जाने की बात सामने आई थी इसकी जांच कराई गई थी लेकिन इसकी हकीकत आज तक सामने नहीं आ सकी है। हो सकता है अयोध्या के राम मंदिर में दान की डकैती का मामला भी कल इसी तरह रफा दफा हो जाए। लेकिन इस घटना ने राम भक्तों और सनातन को मानने वालो की जहनियत को झकझोर कर रख दिया है। खास बात ही है न खाऊंगा न खाने दूंगा जैसे लोक लुभावन जुमले उछालने वाले प्रधानमंत्री मोदी आज किसी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक शब्द बोलने को तैयार नहीं है। राम मंदिर ट्रस्ट में आज अगर चंपत राय का नाम शामिल है वही इस ट्रस्ट में दर्जन भर लोग ऐसे हैं जो संघ से जुड़े हुए हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि संघ और भाजपा मिलकर मोदी की छवि को एक विश्व गुरु ही नहीं एक धर्मगुरु के रूप में स्थापित करने का काम कर रहे हैं। पीएम का अपने आप को नान बायोलॉजिकल होने का बयान भी इसकी पुष्टि करता है साथ ही अभी प्रकाश में आई एक रिपोर्ट जिसमें उनकी धर्मगुरु की छवि गढ़ने पर 2000 करोड़ का खर्च होने की बात सामने आई है। जिसका मकसद सिर्फ आस्था के नाम पर वोट बटोरना ही है। देश व समाज में क्या हो रहा है? इस पर पाठक खुद चिंतन करें तो ज्यादा बेहतर होगा।।

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