- डिजिटल पीढ़ी, सीधे सवालों के साथ कांग्रेस नेता राहुल गाधी ने बना दी है नई युवा रणनीति
- रोजगार, पेपर लीक, शिक्षा व सोशल मीडिया के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचने की कोशिश में कांग्रेस
- भाजपा भी युवा मतदाताओं पर पकड़ मजबूत रखने में जुटी, पड़ोसी देशों के युवा आंदोलनों की चर्चा तेज
देहरादून। देश की राजनीति में एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है जेन-जेड। यह वह पीढ़ी है, जिसने सोशल मीडिया के दौर में आंखें खोलीं, इंटरनेट को किताबों से ज्यादा देखा, मोबाइल को हथियार बनाया और अपने सवालों के जवाब सीधे सत्ता से मांगने की आदत विकसित की। यही कारण है कि अब राजनीतिक दलों की नजर भी इसी पीढ़ी पर टिक गई है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल के महीनों में अपने राजनीतिक अभियान का केंद्र इस नई पीढ़ी को बनाया है। छात्रों से लगातार संवाद, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था के सवालों को उठाकर कांग्रेस युवाओं के बीच अपनी नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राहुल गांधी अब केवल पारंपरिक कांग्रेस वोट बैंक पर निर्भर रहने के बजाय पहली बार मतदान करने वाले और 18 से 30 वर्ष के मतदाताओं को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा आधार बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार हर चुनाव में लाखों नए मतदाता जुड़ते हैं। इनमें अधिकांश जेन-जेड वर्ग के होते हैं। यह पीढ़ी जाति, धर्म और परंपरागत राजनीतिक नारों से आगे बढ़कर रोजगार, करियर, स्टार्टअप, शिक्षा, डिजिटल अवसर, पारदर्शिता और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देती है। यही वजह है कि आज लगभग हर राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई देता है। इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब, एक्स, फेसबुक और पाडकास्ट अब राजनीतिक हथियार बन चुके हैं।
राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में लगातार छात्रों और युवाओं के मुद्दों को उठाया है। उन्होंने पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार सवाल खड़े किए हैं। उनकी सभाओं में अब युवाओं की भागीदारी पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। कांग्रेस का पूरा डिजिटल अभियान भी युवाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि युवाओं के भविष्य का सवाल है तो कांग्रेस उनकी आवाज बनेगी।
यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि भाजपा में खलबली मच गई है। हालांकि इतना जरूर है कि भाजपा भी युवाओं को अपने साथ बनाए रखने के लिए लगातार सक्रिय है। भाजपा पिछले दस वर्षों में स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, पीएम मुद्रा योजना, नई शिक्षा नीति, डिजिटल गवर्नेंस और विभिन्न युवा कार्यक्रमों के जरिए युवा वर्ग तक पहुंच बनाने का प्रयास करती रही है। इसके साथ ही भाजपा का सोशल मीडिया नेटवर्क देश का सबसे मजबूत राजनीतिक डिजिटल नेटवर्क माना जाता है। यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों अब युवाओं के बीच नैरेटिव की लड़ाई लड़ रहे हैं।
हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया के कई देशों में युवाओं ने बड़े जनआंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति के खिलाफ छात्र आंदोलन ने व्यापक राजनीतिक संकट पैदा किया। वही श्रीलंका में आर्थिक संकट के दौरान हजारों युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए। इसके साथ ही नेपाल में भी समय-समय पर छात्र और युवा विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। इन घटनाओं के बाद भारत में भी राजनीतिक विश्लेषक यह चर्चा कर रहे हैं कि क्या युवाओं का असंतोष भविष्य में चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनावी प्रक्रिया, संघीय ढांचा और राजनीतिक परिस्थितियां इन देशों से काफी अलग हैं। इसलिए किसी एक देश की राजनीतिक घटनाओं को भारत पर सीधे लागू करना उचित नहीं माना जाता।
बता दें कि आज का युवा अखबार पढ़ने से पहले मोबाइल खोलता है। राजनीतिक दल भी इसे अच्छी तरह समझ चुके हैं। यही कारण है कि अब चुनावी भाषणों से ज्यादा महत्व छोटे वीडियो, लाइव बातचीत, पाडकास्ट, डिजिटल कैंपेन और वायरल कंटेंट का हो गया है। राहुल गांधी भी अब पारंपरिक रैलियों के साथ डिजिटल संवाद पर विशेष जोर दे रहे हैं, जबकि भाजपा पहले से ही इस क्षेत्र में मजबूत मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव में केवल जातीय समीकरण या पारंपरिक वोट बैंक ही निर्णायक नहीं होंगे।
पहली बार वोट डालने वाले युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, बेरोजगार डिग्रीधारी, स्टार्टअप से जुड़े युवा और डिजिटल दुनिया में सक्रिय मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी कारण कांग्रेस रोजगार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बना रही है, जबकि भाजपा विकास, बुनियादी ढांचे, डिजिटल परिवर्तन, कल्याणकारी योजनाओं और राष्ट्रीय नेतृत्व के मुद्दों पर अपना भरोसा कायम रखना चाहती है।
राहुल गांधी का जेन-ज़ेड की ओर बढ़ता कदम इस बात का संकेत है कि कांग्रेस भविष्य की राजनीति को युवा आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द खड़ा करना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा भी अपने युवा समर्थन आधार को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए समान रूप से सक्रिय है। आने वाले वर्षों में यह मुकाबला केवल दो दलों का नहीं, बल्कि युवा मतदाताओं के विश्वास, उम्मीदों और आकांक्षाओं को अपने पक्ष में करने की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का होगा, जिस दल को नई पीढ़ी का अधिक भरोसा मिलेगा, वही भविष्य की भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में मजबूत स्थिति में होगा।




