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‘मार्च’ की जंग उत्तराखंड में ‘नवंबर’ में!

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  • उत्तराखंड राज्य में में प्री-मैच्योर इलेक्शन की सुगबुगाहट से राजनीतिक दलों की थमी सांसें
  • समय से पहले बजेगा चुनावी बिगुल,जनगणना, अर्द्धकुंभ और सियासी गणित ने बढ़ाई हलचल
  • राजनीतिक दलों की गतिविधियां, संगठनात्मक बैठकों की बढ़ती रफ्तार ने संभावना को दी हवा


देहरादून। समय से पहले विधानसभा चुनाव की चर्चा ने उत्तराखंड की राजनीति को गर्मा दिया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपनी चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में हैकृक्या विधानसभा चुनाव तय समय से पहले हो सकते हैं? अभी विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 तक है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां, संगठनात्मक बैठकों की बढ़ती रफ्तार और चुनावी तैयारियों ने इस संभावना को हवा दे दी है कि प्रदेश में नवंबर-दिसंबर 2026 में ही चुनाव कराए जा सकते हैं। हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह उत्तराखंड के चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी रणनीतिक कवायद होगी। इसकी वजह केवल राजनीति नहीं, बल्कि प्रशासनिक मजबूरियां भी बताई जा रही हैं।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2027 में देशव्यापी जनगणना का कार्यक्रम तय किया है। दूसरी ओर उत्तराखंड सहित उत्तर प्रदेश, पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव भी इसी अवधि में प्रस्तावित हैं। चुनाव और जनगणना दोनों में बड़ी संख्या में शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी तथा सरकारी कर्मचारी लगाए जाते हैं। यदि दोनों प्रक्रियाएं एक साथ होती हैं तो सरकारी मशीनरी पर भारी दबाव पड़ सकता है। इसी कारण समय से पहले चुनाव कराने की चर्चा राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चल रही है। आंकड़ों बताते है कि पिछले दो चुनावों में भाजपा का वर्चस्व रहा है, जबकि कांग्रेस लगातार अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है।
भाजपा ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर संगठन को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। बूथ समितियों की समीक्षा, शक्ति केंद्रों की बैठकों और वरिष्ठ नेताओं के लगातार दौरों ने संकेत दिए हैं कि पार्टी किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहती है। हाल के दिनों में राष्ट्रीय नेतृत्व के उत्तराखंड दौरे, कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों और बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने के निर्देशों ने चुनावी चर्चाओं को और तेज किया है।
मुख्य विपक्ष कांग्रेस भी संगठन को धार देने में जुट गई है। प्रदेश प्रभारी के लगातार दौरे, जिलाध्यक्षों की बैठकों, फ्रंटल संगठनों की समीक्षा और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की रणनीति इस बात का संकेत है कि पार्टी भी संभावित समयपूर्व चुनाव की संभावना को नजरअंदाज नहीं कर रही। हरिद्वार में प्रस्तावित धार्मिक आयोजनों तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं को देखते हुए भी चुनावी कैलेंडर को लेकर चर्चाएं हो रही हैं। यदि चुनाव, धार्मिक आयोजन और जनगणना एक साथ आते हैं तो प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि समयपूर्व चुनाव की संभावना पर राजनीतिक बहस जारी है। यदि चुनाव समय से पहले होते हैं तो सभी दलों को उम्मीदवार चयन, टिकट वितरण, चुनावी घोषणापत्र और संसाधनों की तैयारी अपेक्षा से कई महीने पहले पूरी करनी होगी। छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए यह और बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
बता दें कि उत्तराखंड में लगभग 85 लाख मतदाता हैं। इनमें युवाओं और महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत लगभग 65 प्रतिशत रहा था। इस बार युवाओं, पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं और महिलाओं की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।

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