Home उत्तराखंड देहरादून देश से बड़ी सत्ता?

देश से बड़ी सत्ता?

0
149


देश और देशवासियों को अच्छे दिन लाने का भरोसा देकर जब भाजपा ने प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनाई थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार संसद पहुंचे थे तो उन्होंने संसद की सीढ़ियों पर माथा टेककर दंडवत प्रणाम किया था। उनकी उस तस्वीर को देखकर देशवासियों को न सिर्फ वह भरोसा और मजबूत हुआ था कि वह देश व देशवासियों की अगर तकदीर नहीं बदल पाए तो कम से कम उनके जीवन की मुश्किलों को कुछ आसान तो जरूर कर देंगे। यही नहीं वह देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाएंगे और लोकतंत्र को भी अधिक सबल बनाएंगे। उनका कहना था कि न खाऊंगा न खाने दूंगा, न सोऊंगा न सोने दूंगा। यानी उनकी सरकार में व्यभिचार और भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं होगी किसानो की आए दो गुना करने तथा महंगाई को नियंत्रण में लाने तथा बेरोजगारों को रोजगार देने जैसी बातें उनकी प्राथमिकता में शामिल थी। यह सब कुछ सरकार को 5 सालों में ही करना था लेकिन अब उनके लगातार तीसरी बार तक सत्ता में बने रहने और सबसे अधिक समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड तोड़ने के बाद आम आदमी इस बात को सोचने पर विवश है कि उनके 12 साल के शासनकाल में उसकी दिशा और दशा में क्या कुछ सुधार आया है और क्या कुछ बदला है। भले ही वर्तमान स्थितियों और परिस्थितियों में कोई सत्ता से यह सवाल पूछने की हिम्मत न जुटा सकता हो और उनकी तथा सरकार की कोई जवाब देही न रही हो लेकिन आम लोगों की सोच पर सत्ता का कोई नियंत्रण संभव नहीं है। वह खुद ही सवाल भी कर रहे हैं और सरकार के कामकाज तथा तौर तरीकों के आधार पर यह तय भी कर रहे हैं कि भाजपा व मोदी सरकार के सपने का फैसला कितना गलत और सही था। वर्तमान दौर में जो एक सवाल भाजपा के नेताओं द्वारा उछाला जा रहा है कि अगर सरकार ने कुछ नहीं किया तो जनता उसे लगातार वोट देकर जिता क्यों रही है? इस सवाल का जवाब भी अब आम जनता तो जान ही चुकी है अनभिज्ञ तो सत्ता में बैठे वह नेता भी नहीं है जो प्रधानमंत्री मोदी के संसद सत्र में पहुंचने पर खड़े होकर मेजे थपथपा कर मोदी—मोदी के नारे लगाते हैं जिन्होंने संसद की कार्यश्ौली से लेकर संवैधानिक संस्थाओं के विधान और संविधान तक को अपने अनुकूल बना लिया है। देश के वह किसान जो सालों सालों तक सड़कों पर धरने प्रदर्शनों के बाद भी सरकार करे अपने एमएसपी के कानूनी अधिकार बनाने की बात नहीं मनवा पाये तथा तीन काले कानूनों को रोकने के लिए जान गवांने तक की हद तक डटे रहे। वह बेरोजगार जो परीक्षाएं देकर ओवर ऐज हो गए तथा उनकी सारी मेहनत पेपर लीक की कुव्यवस्था ने लील ली। वह आम आदमी जिसने अपने घर का सोना भी पेट की भूख के लिए गिरवी रख दिया फिर भी उसकी भूख नहीं मिट पाई। भले ही सरकार आज भी पांच ट्रिलियन वाली इकोनामी वाला देश और विकसित राष्ट्र बनाने का खूब जोर—जोर से प्रचार कर रहा हों और विकास की गाड़ी आंकड़ों में सरपट दौड़ रही हो लेकिन अब इसका सच भी सभी जान चुके हैं। पीएम केयर फंड जिसकी कोई जानकारी लेने का हक किसी को नहीं और वह इलेक्ट्रॉलक बाण्ड जिसे सर्वाेच्च न्यायालय ने असंवैधानिक बता कर रदद कर चुकी हो उसके भ्रष्टाचार का सच भी सभी जान चुके हैं। यही कारण है लोग अब पूछ रहे हैं कि सत्ता में बैठे लोगों के लिए राष्ट्र से ज्यादा जरूरी सत्ता क्यों हो चुकी है? क्या अब देश को लोकतंत्र और संविधान की जरूरत ही नहीं रह गई है? अथवा देश तानाशाही व्यवस्था की ओर कदम बढ़ा चुका है? ढेरो सवाल है जिनका जवाब आने का इंतजार यह देश कर रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here