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अलविदा ‘गोल्डन बॉय’

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  • निशानेबाज जसपाल राणा के निधन से उत्तराखंड राज्य में शोक की लहर
  • पहाड़ों की पगडंडियों से वैश्विक मंच तक हर कदम पर देश का मान बढ़ाया
  • दुनिया को अपनी उंगलियों के इशारे पर झुकाया आज यादों का तमगा छोड़ गया
  • एक खिलाड़ी नहीं बल्कि नई पीढ़ी को निशानेबाजी की राह दिखाने वाला ही चला गया
  • 18 साल की उम्र में अर्जुन पुरस्कार

देहरादून। कभी जिस हाथ ने लक्ष्य पर निशाना साधकर देश के लिए गौरव हासिल किया था, वही हाथ आज हमेशा के लिए थम गया। उत्तराखंड की धरती ने अपना वह बेटा खो दिया, जिसने छोटे से पहाड़ी परिवेश से निकलकर दुनिया के खेल मंच पर भारत का नाम रोशन किया था। जसपाल राणा के निधन की खबर ने न केवल खेल जगत बल्कि पूरे उत्तराखंड को गहरे शोक में डुबो दिया है।
जसपाल राणा सिर्फ एक निशानेबाज नहीं थे वह पहाड़ के उन सपनों की कहानी थे जो सीमित संसाधनों के बावजूद आसमान छूने का हौसला रखते हैं। उनके जाने से प्रदेश ने एक ऐसा खिलाड़ी खो दिया, जिसने खेल को पहचान दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता तैयार किया। उत्तराखंड के पहाड़ी परिवेश से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना आसान नहीं था। लेकिन जसपाल राणा ने अपनी मेहनत, अनुशासन और दृदृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जहां पहुंचना हर खिलाड़ी का सपना होता है।
कम उम्र में ही उन्होंने निशानेबाजी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उनके शानदार प्रदर्शन ने भारत को गर्व के कई मौके दिए। एशियन गेम्स और कामनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े मंचों पर उन्होंने देश के लिए पदक जीते। उत्तराखंड अक्सर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और वीरता के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन खेलों की दुनिया में जसपाल राणा ने प्रदेश का नाम एक नई ऊंचाई दी थी। उन्होंने यह साबित किया कि पहाड़ों के गांवों में पलने वाले सपने भी अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकते हैं। उनके प्रदर्शन ने उत्तराखंड के युवाओं को यह विश्वास दिया कि खेल भी भविष्य बनाने का रास्ता हो सकता है।
जसपाल राणा का योगदान केवल उनके अपने पदकों तक सीमित नहीं रहा। खिलाड़ी के रूप में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने कोच की भूमिका निभाई और नई प्रतिभाओं को तराशने का काम किया। युवा निशानेबाजों को तैयार करने में उनका योगदान याद किया जाएगा। उनके मार्गदर्शन में कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। वह मानते थे कि एक खिलाड़ी की असली सफलता केवल खुद जीतने में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को जीतने के लिए तैयार करने में है। जसपाल राणा की खेल यात्रा के पीछे परिवार का बड़ा योगदान रहा। उनके पिता नारायण सिंह राणा भी निशानेबाजी से जुड़े रहे और उन्होंने बेटे को इस खेल की शुरुआती सीख दी। पिता से मिली प्रेरणा और खुद की मेहनत ने जसपाल को देश के शीर्ष निशानेबाजों में शामिल किया।
यह सफर केवल एक खिलाड़ी का सफर नहीं था, बल्कि एक परिवार की उस तपस्या की कहानी थी, जिसने उत्तराखंड को गर्व करने का मौका दिया। खेल की दुनिया में कुछ नाम केवल रिकार्ड और पदकों से नहीं पहचाने जाते, बल्कि उनके व्यक्तित्व और योगदान से याद किए जाते हैं। जसपाल राणा भी ऐसे ही नामों में शामिल हैं। उनका जाना उत्तराखंड के खेल जगत के लिए एक बड़ी कमी है। आने वाले वर्षों में जब भी प्रदेश में निशानेबाजी और खेल प्रतिभाओं की बात होगी, जसपाल राणा का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।
पहाड़ की शांत वादियों से निकलकर दुनिया के मंच तक पहुंचने वाले जसपाल राणा अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मेहनत, उपलब्धियां और खिलाड़ियों के प्रति उनका समर्पण हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। उत्तराखंड ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है।
शूटिंग में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया। मदर टेरेसा द्वारा विशेष सम्मान राष्ट्रीय नागरिक सम्मान उन्हें प्रदान किया गया था। उनकी कोचिंग में भारतीय शूटिंग ने नई ऊंचाइयों को छुआ। विशेष रूप से भारतीय स्टार शूटर मनु भाकर की सफलता में उनका बड़ा योगदान माना जाता है। पेरिस ओलंपिक में मनु भाकर के ऐतिहासिक प्रदर्शन के पीछे जसपाल राणा की मेहनत और मार्गदर्शन को व्यापक रूप से सराहा गया।

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