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भाजपा-कांग्रेस ने शुरू की ‘नेट प्रैक्टिस’

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  • भाजपा सत्ता की हैट्रिक के लिए बूथों को कर रही मजबूत
  • कांग्रेस जनाक्रोश को राजनीतिक ताकत में बदलने की तैयारी
  • भाजपा और कांग्रेस संगठन दे रहे चुनावी रण के लिए धार
  • दलों में बूथ से लेकर सोशल मीडिया तक सक्रियता बढ़ी

देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय शेष है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी आहट साफ सुनाई देने लगी है। सत्ता में काबिज भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ने संगठनात्मक मोर्चे पर अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि 2027 की लड़ाई केवल नेताओं के चेहरे या चुनावी घोषणाओं से नहीं, बल्कि संगठन की ताकत से तय होगी। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस दस साल के वनवास को खत्म कर सत्ता में लौटने का सपना संजोए हुए है। ऐसे में दोनों दलों का फोकस संगठन को धारदार बनाने पर है।
प्रदेश में भाजपा का संगठन इस समय बूथ सशक्तीकरण अभियान, लाभार्थी संपर्क और सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पार्टी का सबसे बड़ा चुनावी चेहरा मानते हुए संगठन उनके नेतृत्व में चुनावी जमीन तैयार कर रहा है। भाजपा की कोशिश है कि समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, चारधाम परियोजना और निवेश जैसे मुद्दों को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में जनता के बीच स्थापित किया जाए। दूसरी ओर कांग्रेस संगठन को फिर से जीवंत बनाने की चुनौती से जूझ रही है। पार्टी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की धीमी रफ्तार जैसे मुद्दे सत्ता विरोधी माहौल बना सकते हैं। इसी कारण कांग्रेस लगातार जनसभाओं, पदयात्राओं और मुद्दा आधारित आंदोलनों के जरिए जनता से जुड़ने का प्रयास कर रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे और लगातार बढ़ती राजनीतिक सक्रियता को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कांग्रेस संगठन गांव-गांव तक अपनी पहुंच बढ़ाने और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने का प्रयास कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में संगठन हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। वर्ष 2022 के चुनाव में भाजपा ने मजबूत बूथ प्रबंधन और संगठनात्मक समन्वय के दम पर सत्ता बरकरार रखी थी। वहीं कांग्रेस को कई सीटों पर संगठनात्मक कमजोरी का नुकसान उठाना पड़ा था। यही कारण है कि इस बार कांग्रेस भी बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों दल युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी अब चुनावी रणक्षेत्र का अहम हिस्सा बन चुके हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों की आईटी और सोशल मीडिया टीमें लगातार सक्रिय दिखाई दे रही हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आने वाले महीनों में संगठनात्मक फेरबदल, नई नियुक्तियां और बड़े नेताओं के दौरे बढ़ेंगे। चुनावी रणनीति का असली केंद्र अब गांव, बूथ और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बनने जा रहे हैं। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है। यह प्रतिस्पर्धा जनसभाओं से ज्यादा संगठन की मजबूती को लेकर है। भाजपा और कांग्रेस दोनों समझती हैं कि 2027 की सत्ता की चाबी देहरादून, हरिद्वार या हल्द्वानी में नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं के हाथ में होगी। इसलिए चुनावी रण को धार देने की सबसे बड़ी जंग इस समय संगठन के मोर्चे पर लड़ी जा रही है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की औपचारिक घोषणा भले अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी शंखनाद कर दिया है। संगठन को मजबूत बनाने की यह होड़ आने वाले दिनों में और तेज होती दिखाई देगी।

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