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नफरत और विद्रोह की आग

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देश में एक तरफ पेपर लीक और शिक्षा विभाग में व्याप्त अव्यवस्थाओं के मुद्दे को लेकर देश की युवा पीढ़ी सड़कों पर सरकार के खिलाफ उतरी हुई है वहीं दूसरी तरफ नफरत की राजनीति सांसदों व नेताओं पर सड़कों पर मारपीट तक जा पहुंची है। तथा हिंदू मुस्लिम होते—होते दोनों समुदाय के लोग हिंसक वारदातों तक आ चुके हैं। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र बचाने की और सामाजिक सुरक्षा की चुनौतियां और भी अधिक गंभीर होती जा रही है। अभी दो—तीन दिन पूर्व पश्चिम बंगाल में टीएमसी के सांसद और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी पर हुआ जानलेवा हमला और उसके एक दिन बाद टीएमसी के नेता कल्याण बनर्जी पर हमला यह बताने के लिए काफी है कि अब सांसद और अन्य नेताओं की सुरक्षा भी इस देश में मुश्किल सवाल हो चुका है। चुनाव के दौरान और उसके परिणामों के बाद जिस तरह बंगाल में तोड़फोड़ तथा हिंसा का दौर सशस्त्र बलों की भारी तैनाती के बाद भी जारी है वहीं अभी यूपी के गाजियाबाद में एक युवक की ईद वाले दिन घर बुलाकर कुछ मुस्लिम युवाओं द्वारा हत्या किए जाने और इसके बाद एक्शन में आई पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी तथा मुख्य आरोपी का एनकाउंटर किये जाने की घटना देश की वर्तमान राजनीतिक हालात और सामाजिक स्थिति को बताने के लिए काफी है। पूरे समाज में नफरत और विद्रोह का जो लावा धधक रहा है वह न तो देश के हित में है न ही समाज के हित में। आम आदमी एक तरफ जहां बढ़ती महंगाई बेरोजगारी और अन्य समस्याओं से त्रस्त है वहीं राजनीतिक विद्रोह और विद्वेष अपने चरम पर पहुंच चुका है। पश्चिम बंगाल की घटनाएं यह बताती है कि कोई भी पार्टी और उनके नेता सिर्फ तभी तक सुरक्षित है जब तक वह सत्ता में है जिस दिन भी वह सत्ता से हट जाएंगे उस दिन उनको सड़कों पर पीटा और घसीटा भी जा सकता है। देश में अब तक दर्जनों मॉब्लिंचिंग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बेवजह भीड़ कब कहां किस तरह से पीट—पीट कर मार देगी? इसका कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर पूरे देश में अब तक कितनी ही घटनाएं सामने आ चुकी हैं। जिसके कारण पूरे समाज में एक अज्ञात असुरक्षा का भाव पनप रहा है। सवाल इस बात का है कि जब देश के नेता ही इस नफरत और विद्वेष की आग में घी डालने वाले भाषण करते रहेगें और उन्हें रोकने टोकने वाला कोई न हो तो फिर आम आदमी किससे उम्मीद कर सकता है कि इस समस्या से उन्हें कोई बचा सकेगा। स्व. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने अपने एक वक्तव्य में संसद में कहा था कि लोकतंत्र संविधान से नहीं लोक लाज से चलता है। लेकिन वर्तमान दौर में जब सत्ता में बैठे नेताओं को जब संविधान की कोई चिंता नहीं है और लोक लाज को जैसे उतारकर खूंटी पर टांग दिया गया है तब फिर लोकतंत्र की बात कतई बेमायने हो जाती है। सत्ता सिर्फ सत्ता तक की सोच तक सिमट चुकी है जिसे पाने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिए ही अब राजनीति का उद्देश्य शेष बचा है। सबका साथ और सबका विकास और सबका विश्वास जैसी बड़ी बातें सिर्फ लोक लुभावन नारों तक ही सीमित होकर रह गई है अगर वास्तव में इनका कोई सरोकार राजनीति से रहा होता तो आज न तो देश की राजनीति का हाल यह होता और न समाज के सामने अपनी सुरक्षा से लेकर अन्य तमाम समस्याएं मुंह बाए खड़ी होती। नफरत और विद्वेष कि यह आग कैसे बुझाई जा सकती है इस मुद्दे पर वर्तमान दौर में कोई चर्चा करने को भी तैयार नहीं है।

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