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घोर आर्थिक संकट में फंसा देश

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इसमें किसी को भी कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से सोना न खरीदने से लेकर पेट्रोल—डीजल तथा खाघ तेलों से लेकर अन्य अपने तमाम खर्चों में कटौती करने की जो अपील की है वह बेवजह नहीं है। इसके सीधा मतलब है देश की वित्तीय स्थिति का डांवाडोल होना। इस आर्थिक संकट के पीछे तमाम प्रत्यक्ष और परोक्ष कारण है। यह अलग बात है कि सरकार इसके पीछे ईरान—इजरायल युद्ध के कारण लाल सागर के आयात मार्ग को बाधित होने का कारण बताकर अन्य आर्थिक नीतियों में असफलता के मुद्दों को छिपाने की कोशिश कर रही हो। डॉलर के मुकाबले रुपए का इतना कमजोर होना कि आयात निर्यात का संतुलन ही बिगड़ जाए और सरकार की वह मजबूरी कि वह अपने रिजर्व कोष की पाबंदियों से अधिक खर्च न कर पाए तब सरकार के पास जनता से त्याग की अपील करने के सिवाय और रास्ता भी नहीं बचता है लेकिन पीएम मोदी जो अब तक देश के लोगों के सामने तमाम तरह की ऊल—जुलूल नसीहत करते रहे हैं इसलिए उनकी वर्तमान नसीहतों का भी सोशल मीडिया पर खूब मजाक बन रहा है तथा पीएम की बात को कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है। पीएम मोदी और उनकी सरकार के सामने अब जो अविश्वास का माहौल बन चुका है उसे साधने में अब भाजपा का आईटी सेल और भाजपा शासित राज्यों द्वारा भी युद्ध स्तर पर प्रयास किया जा रहे हैं। पीएम मोदी की अपील के बाद भी उनकी अपनी रैलिया में भीड़ जुटाना तथा मंत्रियों और विधायकों द्वारा अपने खर्चों में कटौती न करने पर जब विपक्ष ने सरकार की घेराबंदी की कि वह दूसरों को नसीहते और खुद मियां फजीहत बन रह है, तब जाकर भाजप का नेतृत्व जागा और पीएम के काफिलो और राज्यों की सरकारों तक इसका असर देखने को मिला। नेता विपक्ष राहुल गांधी एक समय में पीएम मोदी का मजाक बनाते हुए उन्हें सूट बूट वाली सरकार बताते थे। तब लोग राहुल को भला बुरा कहते थे लेकिन अब उन्हें भी समझ आ गया है कि सूट भूट वाली मोदी सरकार ने देश की आर्थिक बदहाली को कितनी गहरी खाई में धकेल दिया है भाजपा का आईटी सेल अब खोज खोज कर उन पूर्व प्रधानमंत्रियों की ऐसी अपीलों को प्रचारित कर रहा है लेकिन विडंबना यह है कि पूर्व सरकारों के समय में देश की हालात क्या थे? 1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों से अन्न बचाने के लिए सोमवार का व्रत रखने की अपील की गई थी लेकिन तब देश में अन्न का भारी आकाल था और सादा जीवन उच्च विचार की श्ौली के तहत अमेरिका पर अन्न की निर्भरता को कम करना चाहते थे। देश हित में उन्होंने खुद भी उपवास किए थे तथा इंदिरा गांधी ने अपने जेवर दान कर दिए थे। आज भारत के सामने वैसी स्थितियां नहीं है। एक तरफ सरकार विकसित भारत की बात करती है और 5 ट्रिलियन वाली अर्थव्यवस्था का ढोल पीटती है और दूसरी तरफ लोगों से त्याग की अपील की जाती है व अपील से पूर्व पांच राज्यों में धन को धुआ—धुआ बनाकर उड़ाने के बाद की जाती है। अगर देश इतने बड़े संकट में था तो सरकार को चुनाव से पूर्व या चुनाव के समय में ही इस त्याग के लिए अपील करने का साहस दिखाना चाहिए था लेकिन पीएम तो चुनाव के बाद भी रोड व जीत के जश्न और शपथ ग्रहण समारोह में खूब भीड़ जुटाने व खर्च करने में व्यस्त दिखे? ऐसे में जनता का सवाल उठना भी वाजिब है भले ही सरकार इसका जवाब दे न दे और तो और अभी कुछ नेता स्वच्छ भारत अभियान की तरह सड़कों पर झाड़ू लगाने व फोटो शॉप करने की तर्ज पर स्कूटर की सवारी करने का दिखावा कर रहे हैं ऐसे में जनता भी इन पर क्या भरोसा करेंगी? सोचनीय सवाल है। लोग पूछ रहे हैं क्या कमाल है घोर आर्थिक संकट में भी अवसर की यह तलाश।

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