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चीरहरण और युद्ध का उद्घोष

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भले ही यह कहा जाता रहा हो कि राजनीति और प्यार में सब कुछ जायज होता है लेकिन सच यह है की राजनीति और प्यार में ही सबसे अधिक पारदर्शिता और विश्वसनीयता जरूरी होती है। पांच राज्यों के चुनावों के दौरान अगर सभी की जिज्ञासा के केंद्र में पश्चिम बंगाल था तो क्यों था? चुनावी नतीजों के बाद इस सवाल का जवाब सभी को मिल चुका है। हर आम और खास आदमी से लेकर सभी दलों के नेता इस सच से बखूबी वाकिफ है कि यह चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव नहीं था। इस चुनाव को अपनी इच्छानुकूल बनाने के लिए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग द्वारा एक सुनियोजित रणनीति तैयार की गई थी। जिसमें एसआईआर जिसके माध्यम से 22 लाख ऐसे मतदाताओं से उनके मताधिकार छीना गया जो सुप्रीम कोर्ट तक अपील में गए तथा 8 लाख ऐसे मतदाताओं का नाम जोड़ा गया जिनकी जानकारी नहीं दी गई। इस राजनीतिक खेल की यह सबसे अहम कड़ी थी जिसे न्यायपालिका ने यह कहकर नजर अंदाज कर दिया था कि अगर एक बार वोट नहीं डालोगे तो क्या हो जाएगा अगली बार डाल देना। चुनावी दौर में राज्य के सभी बड़े अधिकारियों सहित व्यापक पैमाने पर किए जाने वाले ट्रांसफर और भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती सब कुछ एक सुनियोजित तरीके से किए गए काम है क्योंकि सत्ता में बैठे लोगों को पता था कि चुनावी नतीजों के बाद क्या होगा? ममता बनर्जी अब अगर सीएम पद से इस्तीफा भी नहीं देती है तब भी वह नई निर्वाचित सरकार को सत्ता संभालने से नहीं रोक पाएगी? 9 मईं को उनकी सरकार का कार्यकाल पूरा होने पर स्वतः ही वह पूर्व मुख्यमंत्री हो जाएगी मुख्यमंत्री रहते हुए जब उन्हें स्ट्रांग रूम में घुसने से रोका जा सकता है तथा उनके मुख्य पर्यवेक्षक तथा उनके साथ मारपीट की जा सकती है तब जब न उनकी सरकार होगी न वह मुख्यमंत्री होगी तब क्या—क्या हो सकता है? इसकी कल्पना भी वह नहीं कर सकती हैं। जिसकी शुरुआत भाजपा की जीत के साथ ही उनके आवास पर जय श्री राम के नारे लगाए जाने, टीएमसी के कार्यालय पर बुलडोजर चलाने व जगह—जगह उनके कार्यकर्ताओं के साथ होने वाली मारपीट हिंसा व आगजनी के रूप में सामने आना शुरू हो गया है। विपक्ष को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि वह इस तरह हार जाएगी या हरा दी जाएगी। लेकिन उनकी इस हार के बाद अब इंडिया ब्लॉक के सभी छत्रपों को यह समझ आ गया है कि सत्ता में रहते हुए जब ममता जैसी नेता स्वयं का किला नहीं संभाल पाई तो वह तो सत्ता में भी नहीं है उनके लिए तो यह कतई भी आसान नहीं होगा। यही कारण है कि वह अब सारे के सारे ममता के संघर्ष में उनके साथ खड़े नजर आ रहे हैं और युद्ध का शंखनाद कर रहे हैं। ममता ने साफ कर दिया है कि वह भाजपा का अत्याचार अब और नहीं सहेंगी। सवाल यह है कि जब चुनाव आयोग और न्यायपालिका उनकी आपत्तियों को सुनने के लिए तैयार नहीं है तब उनके पास विकल्प क्या बचता है? जनता जो उन्हें नकार चुकी है तथा अब उनके आंदोलन या लड़ाई लड़ने के ऐलान के बाद भी जनता की प्रतिक्रिया बेहद बेदम दिख रही है तब उनकी राह आसान कैसे हो सकती है। भले ही भाजपा की राजनीति का उद्देश्य सिर्फ राज करना हो और उसका राष्ट्र नीतियों से कोई सरोकार न रहा हो लेकिन उसके पास सत्ता तथा धन का जो बड़ा बल है उसके सामने उनकी लड़ाई किस मुकाम तक पहुंच पाएगी यह समय ही बताएगा?

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