Home News Posts उत्तराखंड हिमालय पर बन रही परिस्थितियां अत्यन्त चिंताजनकः उपाध्याय

हिमालय पर बन रही परिस्थितियां अत्यन्त चिंताजनकः उपाध्याय

0
150

देहरादून। हिमालय बचाओ—गंगा बचाओ अभियान एवं वनाधिकार आंदोलन के प्रणेता विधायक किशोर उपाध्याय ने हिमालय बचाओ—गंगा बचाओ अभियान के तहत खिचड़ी पर्व एवं मकर संक्रांति के अवसर पर कहा कि यह पर्व मुख्यतः जल देवता को समर्पित है। उपाध्याय ने कहा है कि जिस तरह हिमालय पर परिस्थितियां बन रही हैं, अत्यन्त चिंता जनक हैं। हिमालय में बर्फ एक तिहाई भी नहीं रह गई है और उसी तरह की स्थिति गंगा सहित हिमालयी नदियों में जल की भी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ समय के उपरान्त एवरेस्ट की चोटी पर भी हिम के दर्शन नहीं होंगे। उपाध्याय अभी गंगा सागर भी इस अभियान के सन्दर्भ में गए थे। वहाँ की स्थिति अत्यन्त चिन्ता जनक है। मूल कपिल मुनि आश्रम से समुद्र ने गंगा सागर द्वीप की लगभग 30 किलोमीटर भूमि लील ली है और भविष्य में द्वीप सागर में समा जायेगा यही स्थिति विश्व के समुद्रीय देशों और तटवर्ती भागों की होने जा रही है। यह मानव जनित त्रासदी है और मानव ही इसका निराकरण कर सकता है।
उपाध्याय ने कहा कि वे एक सन्त—साधु समाज से हिमालय गंगा बचाने का निवेदन करने जा रहे हैं, क्योंकि सभी साधु—संन्यासी, सन्त, महन्त गंगा और हिमालय को अपनी शत्तिQ और भत्तिQ का स्रोत मानते हैं। अगला कुंभ संभव होगा? प्रश्न चिह्न है। हो सकता है अगले कुम्भ तक गंगा का जल खत्म होने के कगार पर हो। प्रतिदिन 200 क्यूसेक जल टिहरी बांध से कुम्भ के लिए प्रदान करने पर ही महाकुम्भ संभव हो पाया है। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव और तापमान बढ़ने से हिमालय में ग्लेशियर की संख्या घट रही है। गंगा यमुना पर गंभीर संकट बना हुआ है। हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर तेजी के साथ काम हो रहे हैं। इसके चलते गंगा यमुना जैसी नदियों में जल आपूर्ति और जलवायु स्थिरता खतरे में है। यह बात मिजोरम विश्वविघालय आइजोल के विद्वानों के 30 सालों के अध्ययन में सामने आई है। हिमालय तीव्र परिवर्तन से गुजर रहा है। लगातार बाधित हो रही जलवायु स्थिरता से न केवल स्थानीय आबादी बल्कि वैश्विक जलवायु को भी खतरा है, बर्फ की चादर की स्थानिक कालिक गतिशीलता और बर्फ के टुकड़ों का विखंडन होना चिंता का विषय है।
विशेष रूप से गंगा और यमुना जैसी महत्वपूर्ण नदियों को पोषित करने वाले ग्लेशियरों के लिए पिछले कुछ दशकों में केंद्रीय हिमालय ने गर्मी में बहुत अधिक वृद्धि देखी है। इससे ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और बर्फ की चादर में कमी हो रही है। गंगोत्री, यमुनोत्री और पिंडारी जैसे ग्लेशियर कमजोर हो रहे हैं। यहां ग्लेशियर पीछे की तरफ हट रहे हैं। साथ ही मोटी परत भी काम हो रही है।
साल भर बर्फ से लदी रहने वाली हिमालय की ऊंची चोटियों पर बर्फ नहीं है। अध्ययन में सामने आया है कि मोटी बर्फ की चादर में निरंतर कमी आ रही है। 1991 से 2021 तक शिखर पर बर्फ अवधि के दौरान मोटी बर्फ का क्षेत्र 10,768 वर्ग किलोमीटर से घटकर 3,258.6 वर्ग किलोमीटर रह गया है, जो एक खतरनाक कमी का संकेत है। ठीक इसके विपरीत पतली बर्फ की चादर 1991 में 3,798 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2021 में 6,863.56 वर्ग किलोमीटर हो गई है। इससे क्षेत्र में गर्मी बढ़ गई है। औली और उसके आसपास के क्षेत्र जो पहले हमेशा बर्फ से ढके रहते थे। अब वहां बर्फ नहीं है। नैनीताल में बर्फबारी की आवृत्ति कम हुई है। 1990 के दशक में यहां अक्सर बर्फबारी होती रहती थी, लेकिन अब इसकी आवृत्ति दो या तीन वर्षों में एक बार होती है। स्थिति ऐसी ही रही तो आने वाले समय में गंभीर वैश्विक संकट के आसार हैं’।
उपाध्याय ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र एवं गंगा के उद्गम में जन्म लेने के कारण वे गत 40 वर्षों से इस अभियान की सफलता हेतु कार्य कर रहे हैं।
हिमालय भौतिक और सामरिक रूप से भी हमारा रक्षक है। आज 15 जनवरी हो गई है और एक बूँद बर्फ नहीं पड़ी है। मानसूनी हवाओं ने हिमालय को लांघ लिया है, दक्षिण एशिया के लिए यह अत्यन्त चिंता का विषय है। हिमालय और उससे निःसृत सरिताओं की रक्षा का संकल्प इस पवित्र पर्व को सार्थक बना सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here