बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का प्रचार अभियान खत्म हो चुका है। दो चरणों में होने वाले मतदान के बाद अब सभी की नजरे सिर्फ इसके नतीजों पर ही रहेगी। बिहार के इस चुनाव के परिणाम देश की भावी राजनीति की दिशा और दशा को तय करने वाले हैं। इस बात की चर्चाएं बहुत पहले से ही जारी थी लेकिन चुनाव निपटते—निपटते इन चर्चाओं में तमाम अन्य तथ्यों के शामिल होने से न सिर्फ इस चुनाव के रोमांच को बढ़ा दिया है अपितु नेताओं की धड़कनों को भी बढ़ा दिया है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिनकी पार्टी के बारे में कहा जाता है कि उसे सीट कितनी भी कम या ज्यादा मिले लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बनेंगे। इस बार भाजपा उनके इस मंसूबे को पूरा नहीं होने देना चाहती है। इस सत्य और तथ्य को नीतीश बाबू भी बहुत अच्छे से और बहुत पहले से जान चुके हैं। एनडीए के साथ मिलकर उनका चुनाव लड़ना भले ही उनकी मजबूरी रहा हो लेकिन भाजपा उनके वजूद को महाराष्ट्र की शिवसेना की तर्ज पर खत्म कर सकेगी यह इतना आसान भी नहीं है। भाजपा के नेता भले ही इस बार नीतीश कुमार का वर्चस्व तोड़ने और अपना मुख्यमंत्री बनाने के इरादे से चुनाव मैदान में उतरे हों और एनडीए ने अपना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न किया हो लेकिन नीतीश कुमार से बड़ा कोई दूसरा खिलाड़ी बिहार में हो ऐसा भी नहीं है। बिहार चुनाव में दूसरे चरण के मतदान से पूर्व ही तीर और लालटेन एक ही बात है जैसे जुमले अगर चर्चाओं में है तो दूसरी ओर चंद्रबाबू नायडू और नीतीश के बीच चुनाव परिणामों के मनमाफिक न आने और भाजपा का खेल बिगड़ाने की चर्चाएं भी आम है। दरअसल दूसरे दौर का मतदान इस चुनाव के नतीजे तय करने वाला है। जिन 121 सीटों पर मतदान होना है उनमें से भाजपा ने पिछले चुनाव में 70 सीटों पर जीत दर्ज की थी। रही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जादू की तो इस चुनाव में उनका जादू कोई काम करता नहीं दिख रहा है भाजपा को भरोसा है कि महिलाओं और युवाओं के खातों में जो 30,000 करोड़ की रकम चुनाव से पूर्व डाली गई है उसे लेकर भाजपा यह माने बैठी है कि यह सौगात ही उसे चुनाव जिताने के लिए काफी है। इन मुफ्त की रेवड़ियों का कितना फायदा उसे मिल पाता है। यह तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे। वोट चोरी के मुद्दे ने भाजपा को इस चुनाव में बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मोदी और शाह की जनसभाओं और रैलियो में कुर्सियां खाली होने की तस्वीरें आ रही है तथा नीतीश के काफिले पर लोग कीचड़ और गोबर फेंक रहे हैं। उससे उनकी स्थिति जमीन पर तो मजबूत नहीं दिख रही है। प्रधानमंत्री मोदी का चुनाव प्रचार की अवधि समाप्त होने से 2 दिन पूर्व ही प्रचार से हट जाने से भी लोग यही अनुमान लगा रहे हैं कि या तो भाजपा ने अपनी पहले ही हार मान ली है या फिर उसे अपने चुनावी मैनेजमेंट पर पूरा भरोसा है कि चुनाव तो वही जीतेंगे। इसके अलावा जो सबसे अधिक चर्चा का विषय है वह है भाजपा की बिहार हार के साथ ही केंद्र में भी उनकी सत्ता का पतन अथवा क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व समाप्ति का उद्घोष। परिणाम क्या होंगे इसके लिए थोड़ा इंतजार जरूर करना है। लेकिन परिणाम चाहे कुछ भी रहे बिहार विधानसभा का वर्तमान चुनाव बिहार ही नहीं देश की राजनीति का भी नया अध्याय लिखने वाला साबित होने वाला है इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं किया जा सकता है। मोदी और नीतीश कुमार के साथ ही यह चुनाव राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के राजनीतिक भविष्य की नई पटकथा लिखने जा रहा है।




