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बिहार की कठिन डगर

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बिहार के विधानसभा चुनाव से पूर्व घटित होने वाली तमाम घटनाओं ने केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को ही नहीं अपितु स्वयं को गैर राजनीतिक सामाजिक संगठन बताने वाले संघ (आरएसएस) की प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुंचायी है। इसका सिलसिला उस मणिपुर की तस्वीरों से शुरू हुआ था जिसकी चर्चा देश ही नहीं पूरे विश्व में रही। महिला अत्याचारों से जुड़ी इन शर्मनाक तस्वीरों ने समूची मानवता को झकझोर कर रख दिया था। चारों तरफ से सवाल उठते रहे लेकिन पीएम मोदी ने इन सवालों पर न सिर्फ चुप्पी साधे रखी अपितु एक बार भी मणिपुर जाकर पीड़ितों का हाल जानने का साहस नहीं दिखाया गया। इसके बाद कश्मीर के पहलगांव में आतंकियों द्वारा निर्दाेष पर्यटकों को गोलियों से भूने जाने की घटना और लंबे समय तक इनको ढूंढ पाने में असफल रही सरकार द्वारा पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमला कर उन्हें नेस्ताबूत तो कर दिया गया लेकिन इसे ऑपरेशन सिंदूर नाम दिए जाने से लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा युद्ध विराम की घोषणा करने और भाजपा नेताओं द्वारा घर—घर सिंदूर भेजने की जो योजना चर्चाओं के केंद्र में रही उसने पार्टी की राजनीतिक मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जिसके परिणाम स्वरूप उसे अपना यह अभियान रोकना पड़ा था। भाजपा और संघ के आपसी सहयोग के रिश्ते भले ही जग जाहिर हो लेकिन केंद्र सरकार के इसी तरह के तमाम कामों को लेकर उनमें इतनी कड़वाहट भी घुल गई कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा यह कहते देखे गए कि अब भाजपा को संघ के सहयोग की कोई जरूरत नहीं है। इसी बीच भाजपा और संघ के बीच रिश्तों कि यह दुनिया उस हद तक हिल गई कि अभी तक भाजपा अपने नए अध्यक्ष का चुनाव नहीं कर सकी है। उधर कर्नाटक के एक आईटी प्रोफेसर ने अपने सुसाइड नोट में संघ की शाखाओं में बच्चों के यौन शोषण की गंभीर आरोपों ने देश में तहलका ही मचा दिया गया। यह सब कुछ ऐसे समय में हुआ जब पीएम मोदी इन संबंधों को सामान्य बनाए रखने के लिए संघ को लाल किले की प्राचीर से सबसे पुराना एनजीओ बता रहे थे। तथा उसके स्वर्ण जयंती वर्ष पर सिक्का और डाक टिकट जारी कर रहे थे। संघ के पदाधिकारी भाजपा और संघ की छवि पर उठने वाले सवालों के लिए भाजपा की केंद्र सरकार और बड़े नेताओं को जिम्मेदार मानते हैं। संघ प्रमुख वर्तमान हालात से इतनी अधिक आहत दिख रहे हैं कि बिहार के विधानसभा चुनाव में स्वयंसेवक की भूमिका शुन्य होती दिख रही है। बिहार में संघ की एक हजार से अधिक शाखाएं लगती है लेकिन इस चुनाव में बिहार के स्वयंसेवक सक्रिय नहीं दिखे, जिसका चुनाव पर प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है। बात अगर राजनीतिक परिदृश्य की की जाए तो नीतीश कुमार के साथ सीट शेयरिंग के मुद्दे को लेकर अब तक अन्य तमाम सहयोगी दल भी भाजपा से नाराज है। नीतीश कुमार जो मुख्यमंत्री की कुर्सी को छोड़ने को तैयार नहीं है। वहीं भाजपा इस बार अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए पूरी जोर आजमाइश में लगी हुई है। विपक्षी एकता जो अभी बिखरती दिख रही थी वह फिर से एकजुट हो चुकी है तथा महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को सीएम का चेहरा घोषित कर दिया है वही साहनी को डिप्टी सीएम बनाने पर भी सहमति की मोहर लगाई जा चुकी है। बिहार के इस चुनाव में मोदी का फीका पड़ चुका आकर्षण कितना काम करेगा वह भी वोट चोरी के आरोपो के बीच यह आने वाला समय ही बताएगा। प्रशांत किशोर की भूमिका से जो फेरबदल की संभावनाएं बन रही थी वह भी दम तोड़ चुकी है। ऐसे में भाजपा व जदयू की राह आसान नहीं रहने वाली है।

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