Home उत्तराखंड देहरादून आस्था या उन्माद

आस्था या उन्माद

0
919

संत कबीर का जन्म अगर आज के भारत में हुआ होता और वह ‘पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़, ताते तो चाखी भली जो पीस खाएं संसार’ जैसी कोई बात लिखी या कही होती तो सत्ता और उसके समर्थकों ने उन्हें कोर्ट भी घसीट लिया होता और वह जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए होते। यह बात सत्ता की उस असहिष्णुता के कारण लिखनी पड़ रही है जो लोगों से अभिव्यक्ति की आजादी के उसे अधिकार को भी छीन लेने पर आमादा है जो हमारा संविधान देशवासियों को देता है। उत्तर प्रदेश के जनपद बरेली के शिक्षक डा. रजनीश गंगवार इसका एक उदाहरण है। जिन्होंने अपने स्कूल के छात्रों को अपने एक गीत या कविता के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह कांवड़ लेने न जाए क्योंकि कांवड़ लाकर वह इंजीनियर या डॉक्टर नहीं बन सकते हैं पढ़ लिखकर ही उनका भविष्य बेहतर हो सकता है। बच्चों को कावड़ लेने व जाने देने और अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने की शिक्षा देने वाले शिक्षक डॉ रजनीश का यह उपदेश सत्ता के कुछ अंध भक्तों की भावनाओं को इतना आहत कर गया कि उन्होंने एक शिक्षक के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला पुलिस में दर्ज करा दिया गया है जो सही मायने में अपने गुरुत्व के दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। शिक्षक का उद्देश्य सिर्फ यह था कि वह अपनी पढ़ाई का नुकसान न करें किसी को भी शिक्षक द्वारा जबरन कांवड़ लाने से रोके जाने का काम तो किया नहीं जा रहा था। लेकिन धर्म और आस्था की लहर पर सवार लोगों को भला कोई क्या समझा सकता है। क्योंकि उन्होंने जितना भी ज्ञान अर्जित किया है वह सत्ता की व्हाट्सएप मीडिया से किया है। जिस पर सत्ता का एकाधिकार है। वह भी ऐसा एकाधिकार जो न्यायालय की भी नहीं सुनता है। बीते साल कावड़ यात्रा मार्गों पर होटल, ढाबो, रेहड़ी पटरी पर खुले सभी प्रतिष्ठानों को अपनी पहचान उजागर कराने वाले बोर्ड लगाने के आदेश सत्ता ने दिये थे। जब यह मामला देश की सर्वाेच्च अदालत में पहुंचा तो इसे गैर जरूरी और संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए इस पर रोक लगाने के आदेश दिए गए थे। लेकिन इस बार फिर सत्ता ने इन आदेशों को नजर अंदाज करते हुए वैसा ही किया गया। जो इस बात का सबूत है कि सत्ता में बैठे लोग वही करते हैं जो उन्हें करना होता है वह न्यायपालिका की बात भी नहीं सुनते हैं। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने फिर यूपी तथा उत्तराखंड की सरकारों को कड़ी फटकार लगाते हुए इस पर जवाब तलब किया गया है। रही बात कांवड़ियों द्वारा मचाये जा रहे हुड़दंग और उत्पात की तो उसकी तस्वीर पूरा देश हर रोज देख रहा है कांवड़ जैसी धार्मिक और आस्था से परिपूर्ण इस यात्रा में क्या कुछ नहीं हो रहा है महिलाओं से मारपीट, तोड़फोड़ और लूट तथा कम उम्र के वह बच्चे जो यात्रा में भोले बनकर शामिल हो रहे हैं हाथों में लठ्ठ लेकर वाहनों में तोड़फोड़ और मारपीट कर रहे हैं। इन हिंदुओं के बच्चों को हम सनातनी के नाम पर क्या सिखा रहे हैं तथा भावी पीढ़ी को किस तरह नफरत और हिंसा की आग में झोंक रहे हैं? समझ से परे है। ऐसा लगता है जैसे जानबूझकर एक ऐसा कुचक्र रचा जा रहा है जिसका भविष्य घोर अंधकार की तरफ जा रहा है। यह कैसी आस्था है? कैसा सनातन है तथा कैसी सत्ता है और कैसी व्यवस्था है सब कुछ गंभीर सवालों के बीच खड़ा दिखाई देता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here