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एहतमाद—ए—विपक्ष

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इन दिनों भारतीय राजनीति के पटल पर बहुत कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो चौंकाने वाला है। नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियो को खास तवज्जो दिया गया और विकसित भारत के लिए टीम इंडिया की अनिवार्यिता को रेखाकिंत करते हुए यह कहा जाना कि जब तक सभी राज्यों का विकास नहीं होगा तब तक इस लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता है। पीएम द्वारा बैठक में जिस गर्मजोशी के साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री सोरेन जिन्हे चुनाव से पहले बेवजह जेल भिजवाया गया था पंजाब के सीएम भगवंत जिनकी सरकार को गिराने का प्रयास किया गया था तथा तमिलनाडु के सीएम स्टालिन और रेवंन्त रेड्डी को तवज्जो देते देखा गया वह वाकई हैरान करने वाली तस्वीर थी। जब विपक्ष ने इंडिया के नाम से तीसरे मोर्चे का गठन किया था तब पीएम मोदी को हमने इस गठबंधन ईंडी गठबंधन के नाम से संबोधित करते तो देखा ही था। इससे सदन में विपक्ष को दर्शक दीर्घा बैठने की बात कहते हुए भी सुना था। बीते लोकसभा चुनाव में जब भाजपा अबकी बार 400 पार के नारे के साथ मैदान में उतरी थी तब उसकी सोच विपक्ष विहीन सरकार की ही थी। 2019 के चुनाव तक यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी थी कि भाजपा को निष्पक्ष न्याय विहीन न्यायपालिका चाहिए और मुस्लिम विहीन समाज तथा अभिव्यक्ति की आजादी विहीन मीडिया चाहिए। यही नहीं उसे प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता विहीन संविधान चाहिए। फिर आखिर ऑपरेशन सिंदूर के बाद अचानक भाजपा और प्रधानमंत्री के नजरिए में यह इतना परिवर्तन अचानक कहां से और कैसे आ गया? कि वह आज विपक्षी दलों के नेता भारत का सेवक हूं और भारत को टीम इंडिया बनाने की बात करने लगे। यह बात भले ही अत्यंत महत्वपूर्ण क्यों ना हो लेकिन उतनी ही हैरान करने वाली इसलिए भी है कि क्योंकि पीएम मोदी की राजनीति को समझना मुश्किल ही नहीं हमेशा ही नामुमकिन रहा है। कभी वह कहते हैं कि मैं गुजराती हूं और नसों में सिर्फ पैसा बहता है। अब वह कह रहे हैं कि मैं भारत का सेवक हूं और मेरी नसों में सिर्फ गर्म सिंदूर दौड़ रहा है। अभी बीते दिनों तो उनके द्वारा अपने को कम पढ़ा लिखा और सामान्य आदमी बताया गया था लेकिन बाद में कहा गया है कि उनकी उत्पत्ति बायोलॉजिकल नहीं हुई है उन्हें तो भगवान ने भेजा है वह भी कुछ खास उद्देश्य से। जब प्रधानमंत्री खुद को लेकर स्वयं ही इतने कंफ्यूज है कि उन्हें हर बार अपनी बात एक नए तरीके से कहनी पड़ती है तब उनकी किसी भी बात को लेकर लोगों का हैरान होना भी स्वाभाविक है ऑपरेशन सिंदूर से पहले उनका डंका पूरे विश्व में बजा करता था लेकिन उनके इस ऑपरेशन के समर्थन में इजरायल को छोड़कर कोई एक भी देश खुलकर सामने नहीं आया। वहीं महिलाओं के सिंदूर और सेना के शौर्य को जब उनके द्वारा अपना चुनावी मटेरियल बनाए जाने लगा तो देश के लोगों में इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई। देश की सुरक्षा और सेना के शौर्य को महिलाओं के सिंदूर से जोड़ने की यह राजनीति उन्हें मजाक का पात्र बना चुकी है शायद उन्हें भी इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा। सरकार में उनके सहयोगी पहले से ही उनकी नाक में दम किए हुए हैं। संघ नेताओं को भी अब उनकी राजनीति का रंग ढंग राश नहीं आ रहा है ऐसे मैं उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें लेकिन करना भी तो जरूरी है कुछ न कुछ सही टीम इंडिया बनाने की बात करना उनका एक ऐसा ही काम है।

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