जिलाधिकारी दून, सविन बंसल आम जन सुनवाई करते
देहरादून। इस तस्वीर में आप जिस व्यक्ति को देख रहे हैं कुर्सी पर यह व्यक्ति कोई सामान्य आदमी नहीं है अगर आप इन्हें नहीं पहचानते हंै तो हम आपको बता देते हैं यह देहरादून के जिलाधिकारी हैं सविन बंसल। और उनके कंधे पर हाथ रखकर इनसे इतनी नजदीक और आत्मियता से इनसे बात कर रही यह उनकी माता जी नहीं है उनकी माताजी की उम्र की एक महिला है जो उन्हें अपनी कुछ निजी समस्याएं बता रही है।
सवाल यह है कि वर्तमान दौर में हमने किसी अधिकारी या फिर नेता को इतनी सौम्यता के साथ किसी आम नागरिक की बात सुनते और आत्मियता के साथ मिलते कभी नहीं देखा है। बस इसी बात से प्रेरित होकर हम यह समाचार लिखने पर विवश हुए हैं। काश! हमारे सभी लोक सेवक और लोकनायक ऐसे होते जो इतनी ईमानदारी से निष्ठा पूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करते और जनसाधारण की समस्याओं का समाधान कर पाते। बीते कल दून में उनकी जन सुनवाई के लिए लगी अदालत में 174 मामले आए जिनका निस्तारण उन्होंने मौके पर करा दिया गया। गरीबी के कारण अपनी बेटी को शिक्षा दिला पाने में असमर्थ एक मां के आंसू देख कर उन्होंने नंदा सुनंदा योजना के तहत बेटी को अच्छे संस्थान में दाखिला दिलाने व एमसीए की पढ़ाई करने का रास्ता खोल दिया तो लाचार मां उन्हें लाखों आशीर्वाद देती दिखाई दी। 10 साल से न्याय के लिए भटक रहे एक बुजुर्ग को जब न्याय मिला तो उसकी आंखें भर आई।
अभी बीते दिनों जिलाधिकारी सविन बंसल का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह एक शराब की दुकान पर सामान्य आदमी की तरह लाइन में लगकर शराब खरीद रहे थे। उनसे 20 रूपये अधिक वसूलने पर मौके पर ही दुकान पर कानूनी कार्रवाई की गई थी। निजी स्कूलों की मनमानी, फीस वृद्धि और पुस्तकों पर कमीशन खोरी को लेकर भी उन्होंने बुक शॉप्स पर छापेमारी कराई थी और उन्हें सील कराया था। उनका साफ कहना था कि शिक्षा के क्षेत्र में माफिया गिरी को नहीं चलने दिया जाएगा। अपनी अनूठी कार्यश्ौली के कारण उन्हें काम करने से भी रोके जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं लेकिन हम उनका जिक्र यहां नहीं करेंगे।
हम एक बात जरुर कहना चाहेंगे कि इस दौर में अगर एक लोक सेवक और एक लोकनायक भी अगर इतनी निष्ठा सौम्यता तथा ईमानदारी से जन सेवा का कार्य कर रहा है तो वह असाधारण है। साधारण व्यक्ति ही इतना असाधारण हो सकता है और ऐसे साधारण व्यक्ति ही राष्ट्र और समाज की बड़ी धरोहर होते है तथा घोर अंधकार में उम्मीद की एक किरण भी। वरना कहने को तो देश में न प्रधान सेवकों की कोई कमी है न मुख्य सेवकों की।



