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मुफ्त की रेवड़ियां

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भारतीय राजनीति का सबसे अहम हिस्सा बन चुकी मुफ्त की रेवड़ियाें का जरूरतमंदों को कितना फायदा हो रहा है यह सिर्फ एक अकेला सवाल ही नहीं है अन्य तमाम ऐसे सवाल भी इससे जुड़े हैं जो अत्यंत ही चिंतनीय हैं। देश की राजनीति से लेकर समाज की सोच और दिशा तथा दशा तक को इन मुफ्त की रेवड़ियों की राजनीति ने बदल डाला है। अभी बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मुद्दे पर की गई वह टिप्पणी जिसमें कहा गया था कि जब सरकार मुफ्त में राशन और खर्च करने को नगद पैसे दे रही है तो फिर लोग काम करने क्यों जाएं? काबिले गौर है जब बिना कुछ किये ही किसी की जरूरतें पूरी हो रही हो उसे काम करने की क्या जरूरत है। इसे आप सीधे शब्दों में यह भी समझ सकते हैं की मुफ्त की जो सेवाएं मिल रही है वह समाज को नकारा बना रही है। भले ही यह एक अर्ध सत्य ही सही क्योंकि सरकार द्वारा दिए जाने वाला 5 किलो मुफ्त का यह राशन या अन्य तमाम सुविधाओं को भी जोड़ दिया जाए तो वह महंगाई के इस दौर में जीवन यापन के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। लेकिन इससे गरीब और मध्यम वर्ग के तबके को थोड़ी सी राहत बड़ा शकुनदेय इसलिए महसूस कराती है क्योंकि अगर यह मुफ्त का समान नहीं मिल रहा होता तो उनकी मुश्किलें और भी ज्यादा होती। इसलिए लोगों की सोच अब यह बन चुकी है कि अब सरकार कुछ तो दे रही है पहले तो किसी ने कुछ दिया नहीं था। उन्हें अब यह सोचने लायक भी नहीं छोड़ा है कि तुम्हें दिया कुछ नहीं जा रहा है मानसिक रूप से आर्थिक गुलाम बनाने और हमेशा गरीब ही बने रहने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। अब यह मुफ्त की रेवड़ियां वोट की कीमत भी तय कर रही है तथा यह भी तय कर रही हैं कि किसकी सरकार बनेगी। सरकार जिन गरीब व कमजोर लोगों की मदद के नाम पर यह मुफ्त की रेवड़ियां बांट रही है उनका लाभ पात्र लोगों को मिल रहा है या नहीं यह अलग बात है। लेकिन जो इन योजनाओं के पात्र नहीं है वह इनका पूरा फायदा जरूर उठा रहे हैं लोग मुफ्त का राशन लेकर खुद खा नहीं रहे हैं बल्कि उसे बेचकर पैसे बना रहे हैं। मगर सत्ता में बैठे लोगों को इससे कुछ सरोकार नहीं है उन्हें तो उनका वोट चाहिए था जो आसानी से इन योजनाओं के जरिए उन्हें मिल रहा है। यह मुफ्त की रेवड़ियों का चलन अत्यंत ही तेजी से फैल चुका है इसलिए इसका अब अंत भी जल्द होना तय है क्योंकि मुफ्त के थोड़े से माल से जनता का भी पेट नहीं भर रहा है उसकी चाहत है कि जैसे नेता बिना कुछ किये ऐशो आराम का जीवन जी रहे हैं वैसे ही उन्हें भी मुफ्त की यह रेवड़िया इतनी ज्यादा मिलनी चाहिए कि उनकी जिंदगी भी मौज में कट सके लेकिन यह संभव नहीं है। अब देखना यह है कि मुफ्त की इस रेवड़ियो की राजनीति कब अंौंधे मुंह गिरती है।

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