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शीतकालीन यात्रा का विकल्प

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उत्तराखण्ड राज्य की सरकारों को 25 साल का समय लग गया यह सोचने और समझने में कि अगर राज्य में छह माह चलने वाली चारधाम यात्रा का संचालन पूरे साल किया जाये तो राज्य और राज्य के लोगों की आर्थिकी में सुधार के साथ पलायन जैसी कई अन्य गम्भीर समस्याओं का आसानी से समाधान किया जा सकता है। कल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बाबा केदार की शीतकालीन गद््दी स्थल उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर पहुंच और पूजा अर्चना के साथ शीतकालीन चारधाम यात्रा का औपचारिक रूप से श्रीगणेश का उद्घोष कर दिया गया। पहली बार शुरू की जाने वाली इस शीतकालीन चारधाम यात्रा के बारे में कोई प्रचार नहीं किया गया है और न ही इसके लिए सरकार द्वारा कोई पूर्व तैयारी की गयी है जैसे की मुख्य यात्रा के लिए की जाती है। लेकिन इस यात्रा की इस साल की गयी औपचारिक शुरूआत से इस बात की संभावनाएं जरूर बलवती हो सकती है कि आने वाले समय मे यह शीतकालीन यात्रा ग्रीष्म कालीन यात्रा की तरह ही भव्य और दिव्य रूप ले सकती है। इसके पीछे कई कारण निहित है पहला कारण है कि यात्रा का सुगम होना। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों के मुकाबले यह शीतकालीन गद्दी स्थल सुगम स्थलों पर है तथा धामों के मुकाबले इनकी दूरी भी काफी कम हो जाती है। दूसरा कारण है मानसून काल में भूस्खलन तथा अतिवृष्टि के कारण यात्रा मार्गो पर यात्रियों के सामने आने वाली समस्याओं का कम होना। तथा दुर्घटनाओं की संभावनाओं का कम होना। अगर शीतकाल मे यात्रा का संचालन किया जाता है तो मानसून काल से अधिक सुरक्षित यात्रा संभव है। यही नहीं शीतकालीन चारधाम यात्रा पर आने वाले यात्री इस दौरान जोशीमठ के औली जैसे अन्य तमाम पर्यटक स्थलों पर जाकर इसका आनन्द ले सकेंगे। शीतकाल में भले ही कम संख्या में पर्यटक उत्तराखण्ड आते हों लेकिन बर्फबारी और बर्फ से लकधक प्रकृति का नजारा देखने उत्तराखण्ड आते तो है ही। इनकी संख्या में शीतकालीन चारधाम यात्रा से काफी वृद्धि हो सकती है। चारधाम यात्रा के बारह मासी जारी रहने से पूरे साल चारधाम यात्रा की तरह ही कारोबार भी जारी रहेगा। जिससे लोगों को 6 महीने की जगह पूरे साल कमाने खाने व रोजगार के अवसर प्रदान हो सकेंगें। जो पलायन और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं के साथ रोजगार की समस्या का समाधान हो सकेगा। शीतकालीन गद्दी स्थल उखीमठ जहंा बाबा केदार तथा मुखवा जहंा मंा गंगोत्री (गंगा) व तथा खरसाली जहंा मंा यमुनोत्री और जोशीमठ के पाडुनेश्वर जहंा भगवान बद्रीविशाल के दर्शन हो सकेंगे भी आने वाले समय मेें केदारनाथ, बद्रीनाथ धाम और गंगोत्री, यमुनोत्री धामो की तरह ही महत्व के हो जायेंगे तथा इन सभी शीतकालीन प्रवास स्थलों का विकास भी चारो धामों की तर्ज पर हो सकेगा। उत्तराखण्ड के पर्यटन और आर्थिक विकास में शीतकालीन चारधाम यात्रा मील का एक ऐसा पत्थर साबित हो सकती है जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। भले ही इसमें कुछ सालों का समय लगे। उत्तराखण्ड की सरकारों द्वारा अगर इस मुद्दे पर एक दशक पहले काम शुरू किया गया होता तो अब तक बहुत कुछ बदल चुका होता लेकिन देर से ही सही शीतकालीन चारधाम यात्रा का यह विकल्प अगर संकल्प बन पाया तो यह कल्याणकारी फैसला सिद्ध हो सकेगा।

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