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संविधान, लोकतंत्र व चुनाव आयोग

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इन दिनों देश की राजनीति में संविधान लोकतंत्र और चुनाव आयोग इन्हीं तीनों मुद्दों की गूंज संसद से लेकर सड़कों तक सुनाई दे रही है देश का राजकाज संवैधानिक व्यवस्थाओं के अनुरूप चलना चाहिए और अगर ऐसा नहीं होता है तो इसका मतलब है कि देश के लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष चुनाव पहली संवैधानिक जरूरत है और अगर चुनाव निष्पक्षता के साथ नहीं हो रहे हैं तो यह संविधान और लोकतंत्र दोनों को ही समाप्त करने की एक बड़ी साजिश है। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजो के बाद चुनाव की निष्पक्षता पर सबसे अधिक सवाल उठाए जा रहे हैं जिसका कारण देश का निर्वाचन आयोग जिम्मेदार है। हालांकि चुनावी धांधलियों के इस क्रम के लंबे समय से जारी होने की बात कही जा रही है और इसकी जद में 2019 का लोकसभा चुनाव तक आ गया है लेकिन फिलहाल हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव को लेकर ही जांच पड़ताल सीमित है। बीते कल दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने सदन में खुले तौर पर इस बात की घोषणा कर दी कि वह दो दिन बाद चुनाव आयोग के इस पूरे खेल का पर्दाफाश करेंगे। उन्होंने इसके साथ यह भी कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार का पूरा खेल उन्होंने पकड़ लिया है उनके पास इसके पुख्ता प्रमाण है तथा गवाह और सबूतों के साथ वह इसका भंडाफोड़ करेंगे। चुनावी धांधलियों को लेकर ईवीएम से छेड़छाड़, वोटिंग समाप्त होने के कई कई दिनों तक निर्वाचन आयोग द्वारा मतदान प्रतिशत में किए जाने वाली भारी बढ़ोतरी और मतदाताओं की गणना के अंतर से लेकर तमाम मुद्दों की बात अब तक होती रही है। कुल मतदान से अधिक या कम वोटो की गिनती के बाद अब मतदान से पूर्व चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में विपक्षी दलों के वोटरों के नाम काटे जाने तक यह मामला पहुंच चुका है। देखना यह है कि एक दिन बाद अरविंद केजरीवाल विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ जब इस मामले का खुलासा करने के लिए मीडिया के सामने आते हैं तो कैसी गड़बड़ियां पकड़ने के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं और उनके तथ्यों में कितनी सच्चाई होती है। क्या वह अपने गवाह और सबूतों के आधार पर न्यायालय तक जाकर इन सच्चाइयों को साबित कर पाएंगे? बात जहां तक चुनावी धांधलियों की है तो अब इस सत्य को देश की आम जनता भी जान चुकी है कि कुछ न कुछ तो गड़बड़ है और देश में निष्पक्ष चुनाव नहीं हो रहे हैं। निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार द्वारा जो फेरबदल किया गया है उसके साथ ही इसकी पटकथा लिखी जा चुकी थी। यह अलग बात है कि अब इसकी पटकथा संदिग्ध नजर आने लगी है क्योंकि सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं अधिवक्ताओं से लेकर आम आवाम तक इसके विरोध में न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा रहे हैं। इसलिए इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अब इस खेल का अंत होना सुनिश्चित हो चुका है तथा निर्वाचन आयोग और सरकार का इस मुद्दे को लेकर नया इतिहास लिखा ही जाएगा। इसकी जद में कौन—कौन आएगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन एक बात तय है कि जो लोग देश के संविधान लोकतंत्र और चुनाव आयोग की व्यवस्था को समाप्त करना चाहते हैं वह अपनी कोशिशों में सफल नहीं हो सकते हैं क्योंकि अब तक इस देश का लोकतंत्र बहुत मजबूत हो चुका है।

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