Home उत्तराखंड देहरादून केदारनाथ चुनाव, करो या मरो

केदारनाथ चुनाव, करो या मरो

0
416


केदारनाथ विधानसभा का चुनाव सूबे की सरकार और प्रदेश भाजपा के लिए एक बड़े इम्तहान से कम नहीं है। बीते दिनों हुए मंगलौर अैर बद्रीनाथ सीटों पर हुई हार ने इस चुनौती को और भी गम्भीर बना दिया है। उसके ऊपर से राज्या में उग्र आंदोलन का रूख लेते मूल निवास और भू कानून भी सरकार की बैचेनी बढ़ाता जा रहा है। भले ही भाजपा के नेताओं ने केदारनाथ में जीत के लिए अपनी पूरी ताकत झौंक रखी हो तथा मुख्यमंत्री धामी इसकी पूरी कमान संभाल रहे हो लेकिन उन्हे भी पता है कि अगर केदारनाथ हारे तो इसका मतलब क्या होगा? यही कारण है कि ऐन चुनाव से पूर्व सरकार ने केदारनाथ के विकासके लिए एकमुश्त 45 करोड़ रूपये स्वीकृत कर दिये गये। सरकार द्वारा चारधाम यात्रा मार्गो और केदारनाथ धाम में अतिक्रमण हटाने के लिए जो अभियान चलाया गया था उसे लेकर भी लोगों में भारी गुस्सा तथा नाराजगी देखी गयी थी। यात्रा मार्गो पर जो छोटे कारोबारी और दुकानदार यात्रा सीजन में चार पैसे कमाने की उम्मीद लगाये हुए थे उन्हे सरकार के इस काम से भारी नुकसान हुआ था। तथा हक हकूक धारी भी आंदोलन पर उतर आये थे। दिल्ली में केदारनाथ मन्दिर निर्माण का मुद्दा भी चर्चाओं के केन्द्र में रहा। जिस पर सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा था और इस मन्दिर निर्माण पर रोक लगानी पड़ी थी। केदारनाथ मन्दिर में स्वर्णपरत चढ़ाये जाने और सोने के गबन को लेकर सरकार को सफाईयंा देनी पड़ी थी। अभी तक यह साफ नहीं हो सका है कि इसकी सच्चाई क्या है। ऐसे तमाम मुद्दे है जिन्हे विपक्ष ने पकड़ रखा है और इस चुनाव प्रचार में यह तमाम मुद्दे जोर शोर से उठाये जायेगें। मुख्यमंत्री धामी का प्रयास है कि वह अपनी सरकार द्वारा लव जेहाद और लैंड जेहाद के बाद अभी—अभी चर्चाओं में आये थूक जेहाद का जोर शोर से प्रचार करें। मुख्यमंत्री धामी द्वारा केदारनाथ के विकास को तथा 2013 की आपदा के बाद केन्द्र सरकार द्वारा कराये जा रहे विकास कार्यो को ही अपने मुद्दे बनायेगी। मुख्यमत्री धामी का कहना है कि जनता उन्हे विकास के मुद्दे पर वोट देगी और भाजपा इस चुनाव में बड़ी जीत दर्ज करेगी। लेकिन वह इस बात को भली प्रकार जानते है कि चुनौती आसान नही है। यह अलग बात है कि भाजपा के पास कांग्रेस के मुकाबले अत्यन्त ही मजबूत सांगठनिक ताकत है। लेकिन क्या उनकी यह ताकत मूल निवास और भू कानून जैसे मुद्दों को उनका लव जेहाद, लैंड जेहाद, थूक जेहाद और विकास कार्यो के मुद्दे बेअसर साबित कर पायेगें? यह ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब 23 नवम्बर को आने वाले चुनाव परिणामो से ही मिलेगा। हां एक बात जरूर है केदारनाथ चुनाव का यह मुकाबला बहुत ही कांटे का होगा। भाजपा के लिए इसका जीतना जितना जरूरी है उससे कम महत्व कांग्रेस के लिए भी नहीं है क्योंकि राज्य में उसकी राजनीति का भविष्य केदारनाथ का यह चुनाव तय करने वाला है। उसकी जीत ही भविष्य की संभावनाओं के उन दरवाजों को खोल सकती है जो पिछली असफलताओं से बंद हो चुके है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here