वर्तमान दौर की राजनीति और समाज में किस तरह से नफरत और असहिष्णुता का भाव पनप रहा है वह किसी भी सूरत में राष्ट्रीय एकता और अखंडता तथा आपसी भाईचारे के लिए शुभ संकेत नहीं है। सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि सत्ता का ध्येय सिर्फ येन केन प्राकरेण सिर्फ सत्ता में बने रहने तक सीमित रहा है और इसे रोकने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है। मणिपुर लंबे समय से हिंसा की आग में जल रहा है। सरकार इसे रोकने में नाकाम रही है। अभी महाराष्ट्र में एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी को गोलियों से भून दिया गया जबकि उनके पास सुरक्षा थी। उत्तर प्रदेश के बहराइच और झारखंड के गढ़वा में शोभा यात्राओं पर पत्थरबाजी, हिंसा और आगजनी की घटनाएं इस बात का सबूत है कि समाज में असंतोष और नफरत की आग लगातार उग्र रूप लेती जा रही है। इससे पहले हरियाणा के नूहू सहित अन्य तमाम स्थानों पर सांप्रदायिक तनाव और टकराव की खतरनाक स्थितियांं देखी जा चुकी है। जिसे लेकर समाज में भय और असुरक्षा का माहौल देखा जा रहा है। बात चाहे खाघ पदार्थों में थूक कर या उनमें मूत्र मिलकर परोसे जाने की हो या फिर लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसे शब्दों को तरासते और तलाशने की। नेताओं के उन उकसाऊ और भड़काऊ बयान की जो समाज में इस नफरत और हिंसा की आग को हवा देते रहे हैं उसके पीछे राजनीतिक दल और नेता ही सबसे अधिक आगे दिखाई देते हैं। बहराइच में हुई हिंसा व आगजनी पर विपक्ष के नेताओं द्वारा साफ तौर पर यह कहा जा रहा है कि इसके पीछे उत्तर प्रदेश की 10 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उप चुनाव हैं। जिसके लिए ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है। अगर देश की राजनीति समाज को हिंसा और नफरत की आग में झोंकने का काम कर रही है तो इससे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात क्या कोई हो सकती है। सत्ता और राजनीति का उद्देश्य समाज की सुरक्षा का होता है। समाज को डराने या लड़ाने का नहीं। वर्तमान समय में जो देखा जा रहा है या हो रहा है वह किसी भी राजनीतिक दल के हित में नहीं हो सकता है। भले ही उन्हें इसका कोई तात्कालिक लाभ मिल भी जाए लेकिन इसके दीर्घकालीन नुकसान से नहीं बचा जा सकता है। सामाजिक सुरक्षा और शांति के बिना विकास की कोई बात नहीं सोची जा सकती है। इस मामले में एक और खास बात यह है कि नफरत का यह परिवेश कोई एक—दो दिन में तैयार नहीं हुआ है। लंबे समय से यह आग सुलग रही है जो अब धीरे—धीरे प्रचंड रूप लेती जा रही है। सत्ता में बैठे लोग जिन पर समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी है उन्हें इस मुद्दे पर गहन चिंतन मंथन की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम भी इसी देश व समाज का हिस्सा है। ट्टलगेगी आग तो जद में आयेगें तमाम लोग, इस मोहल्ले में अकेला हमारा मकान थोड़े है,। नफरत और हिंसा से किसी जाति समुदाय संप्रदाय या राजनीतिक का भला नहीं हो सकता है। समाज और राष्ट्र की बात तो दूर की बात है। इसलिए एक नागरिक से लेकर हर राजनीतिक दल और नेता की जिम्मेवारी है कि वह इस नफरत की आग को बुझाने के लिए आगे आए।


