आज देश विजयदशमी का पर्व मना रहा है। बुराई पर अच्छाइयों के इस जीत पर्व के पीछे जो पौराणिक कथाएं हैं उनसे आमतौर पर हम सभी वाकिफ है। युग भले ही कोई भी रहा हो हर एक युग में दो तरह की शक्तियां समानांतर रूप से विद्वमान रहती हैं सतयुग, द्वापर और त्रेता युग की तरह कलयुग में तो बुराइयों का वेग अपने चरम पर है। सच्चाई और अच्छाई पर झूठ फरेब और बुराइयां उस हद तक हावी हो चुकी है कि चारों ओर त्राहिमाम की स्थितियां हैं। हर साल बुराइयों के प्रतीक रावण के पुतलों का दहन किया जाता है और श्री राम की अच्छाई का संदेश रामलीलाओं के मंचन के जरिए दिया जाता है। लेकिन यह कलयुग का रावण इतना प्रभावशाली हो चुका है कि उसे न तो कोई अस्त्र—शस्त्र मार पा रहा है और न अग्नि उसे जला पा रही है। इस कल कालिका काल में यह रावण हर घर और हर मानव में प्रवेश कर चुका है। तब लंका में सिर्फ एक रावण था लेकिन अब हर गली मोहल्ले और घरों में रावण का वास है। सवाल यह है कि क्या सिर्फ रावण का पुतला जलाने की रवायत भर से ही हम समाज से बुराइयों का अंत कर सकते हैं अगर यह संभव होता तो शायद हजारों साल पहले हो चुका होता विजया दशमी का यह पर्व सही मायने में आत्म चिंतन का पर्व है। जब हर एक व्यक्ति को आत्म निरीक्षण करना चाहिए कि उसके अंदर क्या—क्या बुराइयां हैं अगर यह बुराइयां उसके अंदर नहीं होती तो उसका जीवन कैसा होता, स्वार्थ के इस संसार में बिना परमार्थ के कोई अंतर आने वाला नहीं है। जब तक हर व्यक्ति सिर्फ अपने निजी हितों को ही सर्वाेच्च प्राथमिकता देता रहेगा जीवन में कभी शांति की अनुभूति नहीं की जा सकती है। परहित के सुख से आज का आदमी कोसों दूर जा चुका है। जबकि परहित ही सुख का परम आधार है। विजयदशमी का पर्व मनाने से पहले हर घर में 9 दिन तक मां भगवती की पूजा की जाती है। नारी के उस शक्ति स्वरूप की हर साल हम पूजा तो करते हैं किंतु व्यवहारिक जीवन में हम इस सृष्टि स्वरूपा का कितना सम्मान करते हैं यह एक चिंतनीय मुद्दा है। जिस घर या समाज में नारियों का सम्मान नहीं किया जाता है उन्हें प्रताड़ित और अपमानित किया जाता है वहां किसी भी तरह के सुख और शांति की कल्पना भी हम नहीं कर सकते हैं। भले ही हम किसी भी धर्म को मानने वाले हो लेकिन सभी धर्म की शिक्षा दीक्षा लगभग समान ही है। मगर इसे कितने लोग जानते समझते हैं सवाल यह नहीं है सवाल तो यह है कि उसे अपने कार्य व्यवहार में कितने लोग अमल में लाते हैं। आज पूरे देश और समाज में ही नहीं हर एक में अशांति और तनाव तथा संघर्ष की स्थितियां अगर है तो यह बेवजह नहीं है। संसार की कोई भी वास्तु दोष रहित नहीं है हर इंसान के अंदर कोई न कोई कमी और बुराई हो सकती है। जिसे भले ही अन्य कोई न जानता हो लेकिन हर व्यक्ति अपनी हर अच्छाई बुराई के बारे में अच्छे से जानता है। इस विजय दशमी पर आप सिर्फ अपने अंदर की बुराइयों पर चिंतन करें। जिस भी सबसे बड़ी बुराई को चिन्हित कर पाए उस बुराई को समाप्त करने का संकल्प ले। हर सुबह इस संकल्प के साथ जागे। आप देखेंगे कि आप अगली विजयदशमी तक अपने अंदर की एक बुराई रूपी रावण पर विजय हासिल कर चुके होंगे। जब भी आप ऐसा करने में सफल हो जाएंगे उस समय आपको लगेगा कि विजयदशमी का असल पूर्ण यही है।


