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फालतू मुद्दों पर राजनीति

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भले ही देश की आम आवाम अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष के चक्रव्यूह में फंसी हो लेकिन देश के नेता अभी भी जाति—धर्म और मुफ्त की रेंवड़ियंा बांटने और वोट बटोरने के लिए जोड़—जुगाड़ में ही लगे हुए हैं। अभी उत्तर प्रदेश से मंदिरों में लगी सांई बाबा की मूर्तियों को हटाने की खबरें आ रही है। काशी के मंदिरों से मूर्तियां हटाये जाने के बाद अब राजधानी लखनऊ के मंदिरों से भी सांई की मूर्तियां हटाने की बात कही जा रही है। सनातन धर्म के अनुयायियों का कहना है कि सांई कोई भगवान नहीं थे जिनकी मंदिरों में मूर्तियां लगाई जाए? संाई के भक्तों को यह मशविरा भी दिया जा रहा है कि वह चाहे तो संाई के लिए अलग मंदिर बना ले और उनकी पूजा पाठ करें लेकिन हिंदुओं के देवी—देवताओं के मंदिरों में उनकी मूर्तियां नहीं लगनी चाहिए कुछ ज्यादा उतावले लोग इसे हिंदू—मुस्लिम के मुद्दे से भी जोड़ रहे हैं भले ही किसी को सांई की जाति तो क्या उनके जन्म स्थान और माता—पिता के बारे में भी कोई सही जानकारी न हो, हमें भी ऐसी कोई जानकारी नहीं है। लेकिन एक बात जरूर है कि इस तरह के विवाद खड़े किए जाने की भी कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। आमतौर पर सांई को मानने वाले लोगों ने उनके अलग ही मंदिर बनाये हुए हैं। अगर किसी मंदिर में सांई की मूर्ति स्थापित की गई तो सबसे पहला सवाल यही है जो आज इस सवाल को खड़े कर रहे हैं उन्हें पहले ही नहीं होने देना चाहिए था। अभी कुछ नेताओं ने तिरुपति मंदिर के प्रसाद की शुद्धता पर सवाल उठा दिया था तो पूरे देश में इस तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। उत्तराखंड सहित अनेक राज्यों में मंदिरों के प्रसाद की जांच कराये जाने का सिलसिला शुरू हो गया था। हास्यास्पद बात यह है कि अभी तक किसी भी जांच में तिरुपति मंदिर के प्रसाद में किसी भी तरह की जांच में अपवित्रता की पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन यह मामला देश की शीर्ष अदालत तक पहुंच गया। अदालत ने भी इसे लेकर उन नेताओं को कड़ी फटकार लगाई कि उन्होंने बिना किसी जांच और पुष्टि के इस तरह की बात कैसे कह दी। अभी जम्मू—कश्मीर और हरियाणा के चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं के तमाम अल जलूल बयान आए और वोट के लिए इन्हें जातियों के समीकरण साधते देखा गया। अब थोड़ी बात मुफ्त की राजनीतिक रेवड़ियंा बांटे जाने की भी कर ली जाए। लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने खटाखट पैसे बैंक अकाउंट में डालने का खूब प्रचार किया था और हमने देखा था कि पीएम से लेकर तमाम अन्य भाजपा नेता भी इन मुफ्त की रेवड़ियंा बांटने वालों से सतर्क रहने की सलाह मतदाताओं को दे रहे थे। लेकिन अब जिन दो राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उसके चुनाव प्रचार में गृहमंत्री अमित शाह भी जम्मू कश्मीर में मुस्लिम भाइयों को ईद पर दो मुफ्त रसोई गैस सिलेंडर देने की घोषणा करते दिखे। अब देश की सभी राजनीतिक पार्टियों को यह लगने लगा है कि बिना मुफ्त की रेवड़िया बांटे वोट नहीं मिल सकता है। केंद्र सरकार द्वारा 80 करोड लोगों को मुफ्त 5 किलो राशन बांटा ही जा रहा है यह भी मुफ्त की रेवड़िया ही है। दरअसल यह मुफ्त की रेवड़ियंा जनता को भी भा रही हैं या वह इसकी आदी हो चुकी है यही कारण है कि देश में राजनीति अब जन सरोकारों के मुद्दे पर कम फालतू के मुद्दों पर अधिक हो रही है। तथा जाति धर्म और मुफ्त की रेवड़ियंा ही चुनावी मुद्दे बनकर रह गए हैं।

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