सवाल देव संस्कृति की रक्षा का?

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मुद्दा चाहे जो भी हो सूबे के मुखिया पुष्कर सिंह धामी हर एक मुद्दे पर बड़ी बेबाकी से इस बात का दावा करते हैं कि वह प्रदेश की धर्म संस्कृति को खराब नहीं होने देंगे जो वैसा करने का प्रयास करेगा उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जाएगी। बात चाहे नौकरियों में धांधली की हो या फिर लैंड जिहाद और लव जिहाद की अथवा नशा मुक्ति की। लेकिन तमाम सवालों के बीच अनेक लोग यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि क्या वह वैसा कर भी पा रहे हैं जैसा कहते हैं। अवैध कब्जों पर सरकार का जो बुलडोजर चल रहा है उसने अब तक चिन्हित की गई अवैध धार्मिक संरचनाओं को 50 फीसदी भी नहीं हटाया है जिस 11 सौ हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण बताया जा रहा था उसमें से 4 सौ हेक्टेयर को ही मुक्त कराया जा सका है। अब उनका अतिक्रमण हटाओ अभियान धार्मिक अतिक्रमण से हटकर नदियों के किनारे हुए अतिक्रमण और जंगलों में गुर्जरों द्वारा किए गए अतिक्रमण की ओर बढ़ चला है। जबकि अभी राजधानी दून में भी अनेक अवैध धार्मिक अतिक्रमण मौजूद हैं। ठीक ऐसा ही कुछ बैक डोर भर्तियों के मामले में भी देखा गया था सचिवालय और विधानसभाओं में हुई इन बैक डोर भर्तियों में पूरा इंसाफ नहीं हो सका। पहली, दूसरी और तीसरी विधानसभा के कार्यकाल में हुई भर्तियों पर कोई निर्णय आज तक नहीं लिया जा सका है जिन्हें विधिक राय के बाद कार्यवाही की बात कह कर छोड़ दिया गया था। पेपर लीक मामलों के आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद तमाम लोग जमानत करा कर बाहर आ गए तथा लोक सेवा आयोग तक भर्तियों में धांधली का क्रम जारी रहा। लव जिहाद को लेकर इन दिनों जो सबसे अधिक शोर सुनाई दे रहा है उसकी पृष्ठभूमि में जाकर देखें तो राज्य के स्कूलों में शिक्षकों के द्वारा ही नाबालिग बच्चियों के शारीरिक शोषण और उनसे छेड़छाड़ की तमाम घटनाएं आए दिन सुर्खियों में रहती हैं। लेकिन चार धाम यात्रा पर आने वाले लोगों के खिलाफ ऑपरेशन मर्यादा चलाने वालों की निगाह हुक्का पीते युवको पर तो जारी है लेकिन राजधानी सहित तमाम शहरों में चलने वाले हुक्का बारों तक नहीं जाती है जहां नशाखोरी का धंधा धड़ल्ले से चलता है। मुख्यमंत्री प्रदेश को 2025 तक नशा मुक्त राज्य बनाने की बात करते हैं लेकिन अफीम, गांजे से लेकर तमाम तरह की नशीली दवाएं और नशीले पदार्थों का सूबे में कारोबार खूब चल रहा है। बीते कल राजधानी के स्पा सेंटरों पर छापेमारी कर 13 लड़कियों को पकड़ा गया जिसमें बाहर की ही नहीं देहरादून, अल्मोड़ा, टिहरी और हरिद्वार की लड़कियां भी शामिल है। राज्य के स्टे होम और रिजार्टस में क्या हो रहा है इसके लिए किसी भी साक्ष्य की जरूरत नहीं है अंकिता मर्डर केस व दून में एक रिजार्ट में रेव पार्टी पर की गई छापेमारी इसका एक उदाहरण है। राज्य में जो नशा मुक्ति केंद्र चल रहे हैं उनमें आए दिन होने वाली मौतों पर सीएम ने सख्त एक्शन की बात कह कर इन्हें सरकारी संरक्षण में लेने का भरोसा दिलाया था लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी नहीं हो सका है। उत्तराखंड राज्य और उसकी देव संस्कृति की रक्षा एक अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है। जिसे सिर्फ बयानों से या हल्की—फुल्की सोच से पूरा नहीं किया जा सकता है। आमतौर पर यह देखा जाता रहा है कि तमाम सामाजिक समस्याओं का ठीकरा बाहरी लोगों के सर फोड़ कर बचने का प्रयास किया जाता है लेकिन समस्या सिर्फ बाहरी लोगों द्वारा पैदा की गई नहीं है इन समस्याओं को पैदा करने वालों में राज्य के लोग भी शामिल हैं।

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