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बर्बादी का सबब बनती आबादी

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विश्व जनसंख्या दिवस पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में नवंबर 2022 में भारत के सर्वाधिक आबादी वाला देश बनने का जो दावा किया गया है उस पर अधिक चौंकने की जरूरत नहीं है। यह बात अलग है कि यह पहले हो रहा है। पूर्व अनुमान यह था कि 2027 में भारत की आबादी सभी अन्य देशों से अधिक होगी लेकिन यह 5 साल पहले ही हो गया। आबादी की इस विस्फोटक स्थिति को 70 के दशक में ही भांप लिया गया था जब सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन कानून लाया गया था यह कहना कदाचित भी अनुचित नहीं होगा कि इस कानून का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं होने के कारण ही आज देश में न सिर्फ जनसंख्या की स्थिति विस्फोटक हो चुकी है बल्कि जनसंख्या का असंतुलन भी एक बड़ी समस्या के रूप में देश और समाज के सामने है। यूपी के सीएम योगी ने जो कहा है वह कतई भी गलत नहीं है। कि जनसंख्या वृद्धि राष्ट्र व समाज के विकास में सबसे बड़ा अवरोध है। आबादी के असंतुलन से अव्यवस्था और अराजकता का खतरा है। सबसे अधिक आबादी वाले भारत के पड़ोसी मुल्क चीन ने 1979 में एक परिवार एक संतान का कानून लाकर जिस मुस्तैदी से अपनी जनसंख्या को नियंत्रण में रखा गया, अगर भारत में भी परिवार नियोजन को सख्ती से सभी धर्म और जाति के लोगों पर लागू किया गया होता तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि विश्व की 61 प्रतिशत आबादी एशियाई देशों में है इसका अर्थ जहां आबादी अधिक वह विपिन्नता और जहां आबादी कम वहां संपन्नता है। हमने छोटा परिवार सुखी परिवार जैसे नारे तो गढ़ेे लेकिन व्यवहार में वैसा कुछ किया नहीं। आज विश्व की आबादी 800 करोड़ के आसपास है और भारत की आबादी सवा सौ करोड़ से ऊपर हो चुकी है। जो अधिक से भी अधिक है। खास बात यह है कि आज भी कुछ लोग आंखों पर पटृी बांधे बैठे हैं और जनसंख्या विस्फोट की स्थिति को अभी भी राजनीतिक स्टंट बताया जा रहा है। यह स्थिति निश्चित तौर पर बिल्ली को सामने खड़ा देखकर कबूतर के आंख बंद कर लेने और यह सोचने की अब बिल्ली भी उसे नहीं देख रही होगी जैसी ही है। देश में प्राकृतिक संसाधनों की भले ही कितनी भी प्रचुरता क्यों न हो लेकिन जनसंख्या अधिकता की स्थिति में विकास की बात तो दूर गरीबी की रेखा से ऊपर आ पाना भी संभव नहीं होता। बीते चार पांच दशक से भारत विकासशील देशों में शुमार होता रहा है लेकिन विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आज तक भी नहीं पहुंच सका है इसका कारण क्या जनसंख्या का अधिक दबाव नहीं है? देश आजादी का अमृत महोत्सव तो मना रहा है और आधी आबादी भूख से लड़ रही है जिसकी जिंदगी सरकार की सहायता से चल रही है। फिर भी हम जानने को तैयार नहीं है। जनसंख्या के मुद्दे पर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तो छिड़ी है लेकिन किस मुकाम तक पहुंचेगी खुदा जाने।

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