May 15, 2026देहरादून। शासन से प्राप्त निर्देशों के क्रम में ऊर्जा संरक्षण और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने हेतु महानिदेशक सूचना बंशीधर तिवारी ने सूचना विभाग में प्रत्येक शनिवार को “नो व्हीकल डे” के रूप में मनाने के निर्देश जारी किए हैं।महानिदेशक सूचना ने विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों से अपील की है कि प्रत्येक शनिवार को कार्यालय आने-जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन, साइकिल जैसे विकल्पों को अपनाएं। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे प्रयास सामूहिक रूप से बड़े सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं और यह पहल ऊर्जा संरक्षण के राष्ट्रीय अभियान को मजबूती प्रदान करेगी।उन्होंने यह भी कहा कि विभाग स्वयं इस पहल को अपनाकर समाज के सामने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। “नो व्हीकल डे” के माध्यम से न केवल ईंधन की बचत होगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान सुनिश्चित किया जा सकेगा।
May 15, 2026देशभर में पीएम की अपील के बाद मची सादगी की होड़ माननीय व अफसरों का आमजन जैसा दिखने का नया दौर सोशल मीडिया में समाज में अचानक उपज गई नई लहर जनता पूछ रहीकृक्या यह असली बचत है या ‘फोटो सेशन’ देहरादून। वैश्विक आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और अनिश्चितताओं के दौर में प्रधानमंत्री मोदी की सादगी और बचत संबंधी अपील के बाद देश की राजनीति में एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। जैसे ही टीवी पर प्रधानमंत्री ने वैश्विक संकट और मितव्ययिता का आह्वान किया तो सोशल मीडिया पर आर्थिक आपातकाल जैसे हालात हो गए है। माननीय से लेकर छोटे-बडे़ नेता और अधिकारियों को अपनी सादगी और मितव्ययिता का डिजिटल पर प्रदर्शन कर देश में एक अनोखा ट्रेड शुरू हो गया है।अचानक कई माननीयों को सादगी पसंद आने लगी है, जो नेता कल तक बड़े काफिलों और आलीशान व्यवस्थाओं के बीच दिखाई देते थे, वह अब कैमरों के सामने आम आदमी की तरह नजर आने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों की बाढ़ आ गई है। ऐसा लगने लगा है मानो देश में अचानक सादगी की प्रतियोगिता शुरू हो गई हो। हालांकि जनता भी अब राजनीति की इस पटकथा को समझने लगी है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि सादगी सच में अपनानी है, तो क्या केवल कैमरों के सामने क्यों! क्या सरकारी फिजूलखर्ची, बड़े-बड़े काफिले, वीआईपी संस्कृति पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाएगी?प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद देशभर में नेताओं-अधिकारियों की जीवनशैली में अचानक बदलाव दिखाई देने लगा है। हर कोई पैदल आफिस जाने और अपना काफिला कम करने की फोटो मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट करवा रहा है। भाई पीएम की अपील है और उस पर अमल न हो यह तो हो ही नहीं सकता है। क्योंकि यह तो स्टेसस का सवाल जो है।अकेले उत्तराखंड की बात करें तो यहां तो प्रिंट मीडिया में सायं को जब खबरों का पोस्टमार्टम होता है उस समय माननीय और अधिकारियों की सिफारिशें कि फला-फला… और संपादक जी से लेकर यूनिट हैड तक की सिफारिश आ रही है। यही नहीं सोशल मीडिया के सभी प्लेफार्मों पर तस्वीरों के साथ कई वीडियों माननीय और अफसरों की तैर रही है। आमजन यह देखकर हैरान है कि आखिर एकदम से ऐसा कैसे हो गया। जबकि आमजन तो सदियों से सादगी से जी रहा है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में जनसंपर्क और प्रतीकात्मक संदेशों की हमेशा बड़ी भूमिका रही है। स्वच्छता अभियान में झाड़ू लगाना हो या सैनिकों के बीच त्योहार मनानाकृइन संदेशों ने आम जनता पर प्रभाव डाला। अब उसी शैली को दूसरे जनप्रतिनिधि भी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। अधिकारियों के लिए तो यह मजबूरी बन जाती है। आमजन की इस पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग नेताओं अधिकारियों के इस बदले व्यवहार को सकारात्मक मान रहे हैं, जबकि कई लोगों का कहना है कि दिखावा है और कुछ नहीं।
May 15, 2026देहरादून। राजधानी देहरादून में नालोे—खालों पर लगातार हो रहे अतिक्रमण को लेकर नगर निगम की भूमिका पर सवाल उठने लगे है। ताजा मामला कालीदास रोड स्थित नाले पर की गयी कब्जेदारी को लेकर सामने आया है। हालांकि नगर निगम प्रशासन ने क्षेत्रीय पार्षद की उच्च स्तरीय शिकायत के बाद इस नाले पर किये गये अतिक्रमण को हटा दिया गया है। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि जब यह अतिक्रमण किया जा रहा था तो नगर निगम प्रशासन शिकायत के बाद भी गहन निद्रा में सोया पड़ा था।आरोप है कि बिल्डर ने विभागों को गुमराह कर खनन अनुमति हासिल की। और निकाली गयी मिट्टी को प्लाट के पीछे स्थित नाले में डाल दिया गया जो बिन्दाल नदी से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि नाला पाट देने के बाद वहंा निर्माण गतिविधियंा शुरू कर दी गयी।मामले की गम्भीता को देखते हुए क्षेत्रीय पार्षद मोहन बहुगुणा द्वारा इस मामले को लेकर जहंा नगर निगम में इसकी शिकायत की गयी, जहंा कोई कार्यवाही न होता देख उन्होने मामले से जिलाधिकारी कार्यालय को अवगत कराया गया। जिसके बाद त्वरित कार्यवाही करते हुए नगर निगम प्रशासन द्वारा उक्त अतिक्रमण को खाली करा दिया गया है। सवाल यह है कि अगर स्थानीय लोग व क्षेत्रीय पार्षद मोहन बहुगुणा इस मामले को लेकर सजग न होते तो नगर निगम की नाक के नीचे शहर के बीचोबीच यह अतिक्रमण हो जाता।सूत्रों का कहना है कि इस बिल्डर्स का पहले भी विवादों से नाता रहा है ओर इसको नगर निगम प्रशासन ही नहीं जिला व पुलिस प्रशासन भी अच्छे तरीके से जानते व पहचानते हैं। कई प्रार्थना पत्र इसके खिलाफ जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन की टोकरियाें में धूल फांकते देखे जा सकते हैंं।बता दें कि उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा 24 मार्च 2025 को राज्य सरकार को निर्देश दिये गये थे कि रिस्पना व बिन्दाल नदी तथा उससे जुड़े नाले खालों पर अतिक्रमण नहीं किया जायेगा तथा ऐसा करने वालो पर मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही की जाये। लेकिन लगता है कि देहरादून नगर निगम प्रशासन उन आदेशों की अवेहलना कर रहा है। क्योंकि जब अतिक्रमण होता है तो शिकायत के बावजूद वहंा कोई कार्यवाही समय पर नहीं की जाती है। यही बात अतिक्रमण के मामलों में नगर निगम की भूमिका को संदिग्ध बनाता है।
May 15, 2026देहरादून। जिलाधिकारी सविन बसंल के निर्देश पर जिला प्रशासन द्वारा बड़ी कार्रवाई करते हुए अब तक 96 होमस्टे का पंजीकरण निरस्त कर दिया गया है।आज यहां जनपद में कानून व्यवस्था सुदृढ़ बनाए रखने तथा आमजन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जिलाधिकारी सविन बंसल के निर्देशानुसार होमस्टे संचालन की गहन जांच कराई जा रही है। जांच में मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर जिला प्रशासन द्वारा बड़ी कार्रवाई करते हुए अब तक 96 होमस्टे का पंजीकरण निरस्त कर दिया गया है। जिसमें प्रथम चरण में 17 तथा द्वितीय चरण में 79 होमस्टे के पंजीकरण निरस्त कर दिए गए हैं। संबंधित होमस्टे को विभागीय वेबसाइट से भी विलोपित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी है। जिले में होटल रूप में शहरी धनाडय अमीरों के होमस्टे पर डीएम ने कार्रवाई का डंडा चला दिया है। इसी क्रम में जिला प्रशासन की मजिस्टे्रट टीमों ने अब तक जिले के विभिन्न क्षेत्रों में 136 निरीक्षण करते हुए मानक विपरित संचालित मिले 96 होमस्टे का पंजीकरण निरस्त करते हुए पर्यटन वेबसाइट से विलोपित की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जिला प्रशासन ने ऑपरेशन सफाई शुरू करते हुए प्रथम चरण में 17 तथा द्वितीय चरण में 79 अवैध होमस्टे का पंजीकरण निरसत कर दिया है तथा आगे भी कार्रवाई गतिमान रहेगी। विगत कई माह से शहर में बढती आपराधिक घटना नशे एवं ओवर स्पीड में वाहन चलाना अदि घटनाएं बढी है। जिसका एक बडेघ् कारण में से एक होमस्टे में रात भर नियम विस्द्ध बार संचालन आदि निकल कर सामने आए है, जहां लाउड डीेजे नशे गैर कानूनी गतिविधि के अड्डे बन रहे होमस्टे में उपद्रवी प्रवृत्ति के व्यक्तियों के ठहरने से आमजन की जान का खतरा बना हुआ है। इसी के मद्देनजर जिला प्रशासन ने सख्त रूख अख्तियार करते हुए होमस्टे का सत्यापन एवं निरीक्षण किया जा रहा है। होमस्टे होटल में निर्धारित प्रक्रिया पालन किए बिना पर्यटक एवं उपद्रवी प्रवृत्ति के लोग ठहराए जा रहे है। होमस्टे भी लीज पर संचालित हो रहे है जो जिले की कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन रहे है। उपद्रवी प्रवृत्ति के व्यक्तियों द्वारा शहर में हुड़दंग मचाने तथा नशे की हालत में ओवर स्पीड, पिस्टल तमचों से फायरिंग की घटनाएं भी सामने आ रही है। जिलाधिकारी ने कहा कि होमस्टे योजना का मूल उद्देश्य स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक व्यंजनों के प्रचार—प्रसार तथा स्थानीय निवासियों की आय में वृद्धि करना है, किंतु निरीक्षण के दौरान कई होमस्टे का उपयोग होटल अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान की भांति किया जाना पाया गया, जिससे अव्यवस्था एवं कानून—व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था। जिलाधिकारी के निर्देशानुसार सहसपुर एवं रायपुर विकासखंड के नगरीय क्षेत्रों में पंजीकृत होमस्टे की जांच हेतु क्षेत्रवार समितियों का गठन किया गया। समितियों द्वारा निरीक्षण उपरांत 96 होमस्टे ऐसे पाए गए जो उत्तराखण्ड गृह आवास (होमस्टे) नियमावली के प्रावधानों के अनुरूप संचालित नहीं हो रहे थे। इन सभी के पंजीकरण निरस्त करने की संस्तुति की गई, जिसे स्वीकार करते हुए प्रशासन द्वारा कार्रवाई की गई। निरीक्षण के दौरान कई होमस्टे में रसोई की व्यवस्था नहीं पाई गई। अग्निशमन उपकरण अनुपलब्ध या उनकी वैधता समाप्त पाई गई। होमस्टे का उपयोग बारात घर एवं व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। कई स्थानों पर स्वामी का निवास नहीं पाया गया तथा इकाइयों को लीज/किराये पर संचालित किया जा रहा था। निर्धारित क्षमता से अधिक कमरों का संचालन किया जा रहा था। विगत निरीक्षण में विदेशी नागरिकों के ठहराव की सूचना (सी—फॉर्म) उपलब्ध नहीं कराने सम्बन्धी घटनाएं प्रकाश में आई थी। कुछ होमस्टे पंजीकृत होने के बावजूद संचालित नहीं पाए गए।
May 15, 2026उत्तराखंड के पहाड़ों की लाल मिठास और लोकजीवन की धड़कन है काफल देवभूमि की संस्कृति, लोकगीतों और स्वाद में काफल का एक अलग ही स्थान उत्तराखंड में 1200 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिलता है काफल देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में मिलने वाला काफल प्रकृति का अनमोल उपहार है। यह फल केवल स्वाद नहीं देता, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, लोककथाओं और जीवन शैली को भी जीवित रखता है। काफल की लालिमा में पहाड़ की मिट्टी की महक और लोगों की भावनाएं बसती हैं। मसूरी, नैनीताल और अल्मोड़ा जैसे पर्यटक स्थलों के रास्तों पर काफल बेचते स्थानीय लोग पहाड़ों की जीवंत तस्वीर पेश करते हैं।उत्तराखंड के पहाड़ केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, बर्फीली चोटियों और देवस्थलों के लिए ही प्रसि( नहीं हैं, बल्कि यहां की वन संपदा और लोक संस्कृति भी पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखती है। इन्हीं पहाड़ी धरोहरों में एक नाम है काफल। लाल-भूरे रंग का यह छोटा सा जंगली फल पहाड़ के लोगों के लिए केवल एक फल नहीं, बल्कि बचपन की याद, लोकगीतों की आत्मा और पहाड़ी जीवन की मिठास है। गर्मियों के मौसम में जब जंगलों में काफल पकता है, तो पहाड़ की वादियां इसकी खुशबू और रंग से जीवंत हो उठती हैं।काफल हिमालयी क्षेत्रों विशेषकर उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल के पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। उत्तराखंड में यह लगभग 1200 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक मिलता है। इसका पेड़ मध्यम आकार का होता है और फल छोटे-छोटे लाल दानों की तरह दिखाई देते हैं। काफल का स्वाद मीठा और हल्का खट्टापन लिए होता है। यही स्वाद इसे बेहद खास बनाता है। इसे खाने के बाद जो ताजगी महसूस होती है, वह पहाड़ की ठंडी हवा जैसी लगती है।काफल उत्तराखंड की लोक चेतना का हिस्सा है। एक लोककथा काफल पाको, मैं नी चाखो आज भी हर पहाड़ी की आँखों में आंसू ला देती है। यह कहानी एक माँ और बेटी के निस्वार्थ प्रेम और एक गलतफहमी के कारण हुए दुखद अंत की याद दिलाती है, जिससे काफल का भावनात्मक महत्व और बढ़ जाता है। काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान है। यह मध्यम आकार के पेड़ों पर गुच्छों में उगता है। काफल का स्वाद खट्टा-मीठा और बेहद रसीला होता है। इसे खाने का असली मजा तब है जब इसे सिलबट्टे पर पिसे हुए पहाड़ी नमक के साथ मिलाकर खाया जाए। नमक, मिर्च और सरसों के तेल का मिश्रण जब काफल की मिठास से मिलता है, तो वह स्वाद जुबान पर लंबे समय तक बना रहता है।गर्मियों के दो महीनों में काफल ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आय का एक बड़ा जरिया बनता है। स्थानीय लोग सुबह-सुबह जंगलों से काफल तोड़ते हैं और फिर उन्हें टोकरियों में भरकर मुख्य सड़कों और बाजारों तक लाते हैं। यह पूरी तरह से प्राकृतिक है, इसलिए इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। काफल को तोड़ना कोई आसान काम नहीं है। इसके पेड़ ऊंचे और अक्सर ढलान वाले जंगलों में होते हैं। ग्रामीण महिलाएं और युवा अपनी जान जोखिम में डालकर इन पेड़ों पर चढ़ते हैं। काफल की शेल्फ-लाइफ बहुत कम होती है, इसलिए इसे तोड़ते ही तुरंत बाजार पहुँचाना पड़ता है।काफल के पेड़ हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। यह मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और स्थानीय पक्षियों व वन्यजीवों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत हैं। विशेषकर काफल पाको पक्षी की आवाज जंगलों में काफल पकने की सूचना देती है। आज जलवायु परिवर्तन और जंगलों में लगने वाली आग के कारण काफल के पेड़ों पर संकट मंडरा रहा है। बेमौसम बारिश या अत्यधिक गर्मी से इसकी पैदावार प्रभावित हो रही है। इस लाल सोने को बचाने के लिए जंगली प्रजातियों का संरक्षण अनिवार्य है। बाजार में काफल की लालिमा और आयुर्वेदपहाड़ों में अप्रैल से जून के बीच काफल पकता है। गांवों के बच्चे सुबह-सुबह जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। हाथों में छोटी टोकरी या कपड़ा लेकर वह पेड़ों पर चढ़ते हैं और काफल तोड़ते हैं। कई जगह महिलाएं और बच्चे इसे बाजारों में बेचते भी हैं। सड़क किनारे छोटी दुकानों में नमक और मसाले के साथ बिकता काफल यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। गर्मियों में उत्तराखंड के स्थानीय बाजार काफल की लालिमा से भर जाते हैं। आयुर्वेद में काफल को बेहद लाभकारी बताया गया है। इसमें एंटी-आक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है। यह पेट की समस्याओं और कब्ज में रामबाण है। काफल के पेड़ की छाल का उपयोग चर्म रोग और जुकाम की दवा बनाने में होता है। यह फल तनाव कम करने और याददाश्त बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है। लोकजीवन की मिठास है काफलशहरीकरण और पलायन के दौर में नई पीढ़ी धीरे-धीरे पहाड़ की पारंपरिक चीजों से दूर होती जा रही है। मोबाइल और इंटरनेट के समय में जंगल जाकर काफल तोड़ने की संस्कृति कम होती दिखाई दे रही है। फिर भी जब कोई पहाड़ लौटता है और सड़क किनारे काफल बेचती बुजुर्ग महिला दिखाई देती है, तो बचपन की यादें ताजा हो उठती हैं। काफल केवल फल नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा है। इसमें गांव की खुशबू, जंगल की ठंडक और लोकजीवन की मिठास छिपी है। आज जरूरत है कि काफल जैसे पारंपरिक फलों और वन संपदा को संरक्षित किया जाए। स्कूलों और गांवों में इसके पौधे लगाए जाएं। स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराया जाए और लोगों को इसके महत्व के बारे में जागरूक किया जाए।
May 15, 2026इस देश और इस देश की आम जनता की यह दुर्दशा होगी किसी ने भी कभी इसकी कल्पना नहीं की होगी। आजादी के अमृत काल का डंका पीटने वालों और लोगों को अच्छे दिन लाने का झांसा देने वालों ने सत्ता में बने रहने के लिए देश के संविधान और लोकतंत्र को जिस तरह से तहस—नहस करने का काम किया है अब उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। भले ही आम जनता इस समय बेतहाशा बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी की चिताओं में ही डूबी हो और उसे इस बात का डर सता रहा हो कि उनका और भावी पीढ़ियों का भविष्य क्या होगा? लेकिन संविधान और लोकतंत्र की सुरक्षा आज का सबसे बड़ा सवाल हो चुका है। अब तक देश के लोग कांग्रेस नेता राहुल गांधी जो लंबे समय से संविधान की लाल किताब को हाथों में लेकर घूमते देखकर सोचते रहे हो कि उनकी बातों में कोई दम नहीं है लेकिन अब उनकी बात इतनी आगे तक पहुंच चुकी है कि देश की सुप्रीम अदालत ने भी उनकी दलीलों पर मोहर लगा दी है। अभी 2 दिन पूर्व जब देश की सबसे बड़ी इन्वेस्टिगेशन संस्था सीबीआई के डायरेक्टर की नियुक्ति होनी थी पीएम आवास पहुंचे नेता विपक्ष ने चीफ जस्टिस के सामने ही इस प्रक्रिया का हिस्सा बनने से इन्कार करते हुए कहा था कि वह कोई रबर स्टैंप नहीं है कि आप उठाकर जहां चाहे लगा दे। जब उनकी सहमति असहमति के कोई मायने ही नहीं है तो वह इसका हिस्सा क्यों बने साथ ही उन्होंने कहा कि वह यहा संवैधानिक मर्यादाओं के कारण आए हैं। यही बात उनके द्वारा बाहर आकर पत्रकारों से भी कही गई। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अब मुख्य निर्वाचन आयोग अध्यक्ष की चयन प्रक्रिया को असंवैधानिक बताए जाने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान जो टिप्पणी की गई है उसे न सिर्फ निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति प्रक्रिया को बल्कि अन्य तमाम संवैधानिक संस्थाओं के अध्यक्षो की नियुक्तियों को असंवैधानिक ठहरा दिया है। चीफ जस्टिस द्वारा अटॉर्नी जनरल से यह पूछा गया है कि अगर नेता विपक्ष और प्रधानमंत्री की राय किसी भी चयन के समय अलग—अलग होती है तो ऐसी स्थिति में क्या तीसरा सदस्य (जो अब कोई भी कैबिनेट मंत्री होता है) नेता विपक्ष की सहमति के साथ जाएगा? तो अटॉर्नी जनरल ने कहा कि शायद नहीं। इस पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहां कि फिर क्या नेता विपक्ष को सिलेक्शन कमेटी का सदस्य बनाना सिर्फ दिखावा भर है? जब सत्ता को ही इसका फैसला करना है तो यह कैसे संवैधानिक हो सकता है। 2023 में मोदी सरकार द्वारा इस संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव करते हुए संवैधानिक संस्थाओं की चयन कमेटी से चीफ जस्टिस का नाम हटाकर उनकी जगह गृहमंत्री या किसी अन्य कैबिनेट मंत्री को चयन समिति के सदस्य के रूप में शामिल करने की व्यवस्था की गई थी। जो विरोध के बाद भी आज तक जारी है। इसी व्यवस्था के तहत निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष से लेकर सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं का मुखिया नियुक्त करने की पूरी शक्ति पीएम के हाथों में आ गई थी जिसका बेजंा इस्तेमाल सत्ता द्वारा किया जा रहा है। अधिकारी कोई भी हो जिसकी नियुक्ति करने व हटाने का अधिकार एक व्यक्ति के हाथ में होगा तो क्या वह अधिकारी पीएम की इच्छा के विरुद्ध कोई काम कर सकता है इस सवाल का जवाब हर आदमी जान समझ सकता है। निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सवाल यूं ही बेवजह नहीं उठते रहे हैं तथा भाजपा व मोदी यूं ही जीत की गारंटी नहीं बन गए हैं। जो उन्हें कोई हरा ही नहीं सकता है? एक अहम सवाल यह है कि जजों की नियुक्तियाें तक पर जब सत्ता का अधिकार हो चुका है तो न्यायपालिका लोकतंत्र और संविधान की रक्षा में कितनी कर्तव्यनिष्ठ हो सकती है? तब ऐसी स्थिति में आप खुद सोच सकते है कि काहे का चुनाव और किसकी सरकार और किसको न्याय और किसकी जांच क्या कुछ भी संभव है? जब संविधान ही नहीं होगा तो फिर लोकतंत्र कैसे बचेगा।